ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे
ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे
चौपाई ४, दोहा ८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेरे॥ मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे॥ ४ ॥
अर्थ
फिर [गुरुजी से कहा—] हे मुनि! सुनिये। ये सब मेरे सखा हैं। ये संग्रामरूपी समुद्र में मेरे लिये बेड़े के समान हुए। मेरे हित के लिये इन्होंने अपना जन्म तक न्योछावर कर दिया। ये मुझे भरत से भी अधिक प्रिय हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम का स्वागत, भरत मिलाप” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के स्वागत और भरत मिलाप के आनंदमय प्रसंग का वर्णन है।
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राम का स्वागत, भरत मिलाप