रामायण माहात्म्य, तुलसी विनय और फलस्तुति
यहाँ रामायण की महिमा कही गई है, फिर तुलसीदासजी अत्यंत विनयपूर्वक अपनी प्रार्थना अर्पित करते हैं। अंत में इसके श्रवण और पाठ से प्राप्त होने वाले पुण्य एवं कल्याण का वर्णन है।
उत्तरकाण्ड · प्रकरण २१ / २१
प्रकरण पाठ
कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा। ब्यास समास स्वमति अनुरूपा॥ श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी। राम भजिअ सब काज बिसारी॥ १ ॥
अर्थ:
हे नाथ! मैंने श्रीहरि का अनुपम चरित्र अपनी बुद्धि के अनुसार कहीं विस्तार से और कहीं संक्षेप से कहा। हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! श्रुतियों का यही सिद्धान्त है कि सब काम भुलाकर (छोड़कर) श्रीरामजी का भजन करना चाहिये।
प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही। मोहि से सठ पर ममता जाही॥ तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा। नाथ कीन्हि मो पर अति छोहा॥ २ ॥
अर्थ:
प्रभु श्रीरघुनाथजी को छोड़कर और किसका सेवन (भजन) किया जाय, जिनका मुझ जैसे मूर्ख पर भी ममत्व (स्नेह) है। हे नाथ! आप विज्ञान-रूप हैं, आपको मोह नहीं है। आपने तो मुझ पर बड़ी कृपा की है।
देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी। मैं रघुबीर भजन अधिकारी॥ सकुनाधम सब भाँति अपावन। प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन॥ ४ ॥
अर्थ:
हे गरुड़जी! अपने हृदय में विचारकर देखिये, क्या मैं भी श्रीरामजी के भजन का अधिकारी हूँ? पक्षियों में सबसे नीच और सब प्रकार से अपवित्र हूँ। परन्तु ऐसा होने पर भी प्रभु ने मुझको सारे जगत् को पवित्र करनेवाला प्रसिद्ध कर दिया [अथवा प्रभु ने मुझको जगत्प्रसिद्ध पावन कर दिया]।
सुमिरि राम के गुन गन नाना। पुनि पुनि हरष भुसुंडि सुजाना॥ महिमा निगम नेति करि गाई। अतुलित बल प्रताप प्रभुताई॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी के बहुत-से गुणसमूहों का स्मरण कर-करके सुजान भुशुण्डिजी बार-बार हर्षित हो रहे हैं। जिनकी महिमा वेदों ने 'नेति-नेति' कहकर गायी है; जिनका बल, प्रताप और प्रभुत्व (सामर्थ्य) अतुलनीय है;।
सिव अज पूज्य चरन रघुराई। मो पर कृपा परम मृदुलाई॥ अस सुभाउ कहुँ सुनउँ न देखउँ। केहि खगेस रघुपति सम लेखउँ॥ २ ॥
अर्थ:
जिन श्रीरघुनाथजी के चरण शिवजी और ब्रह्माजी के द्वारा पूज्य हैं, उनकी मुझ पर कृपा होना उनकी परम कोमलता है। किसी का ऐसा स्वभाव कहीं न सुनता हूँ, न देखता हूँ। अतः हे पक्षिराज गरुड़जी! मैं श्रीरघुनाथजी के समान किसे गिनूँ (समझूँ)?
तरहिं न बिनु सेए मम स्वामी। राम नमामि नमामि नमामी॥ सरन गएँ मो से अघ रासी। होहिं सुद्ध नमामि अबिनासी॥ ४ ॥
अर्थ:
ये कोई भी मेरे स्वामी श्रीरामजी का सेवन (भजन) किये बिना नहीं तर सकते। मैं उन्हीं श्रीरामजी को बार-बार नमस्कार करता हूँ। जिनकी शरण जाने पर मुझ-जैसी पापराशि भी शुद्ध (पापरहित) हो जाते हैं, उन अविनाशी श्रीरामजी को मैं नमस्कार करता हूँ।
सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी॥ धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा॥ ४ ॥
अर्थ:
वह धन धन्य है जिसकी पहली गति दान में होती है। वही बुद्धि धन्य और परिपक्व है जो पुण्य में रत है। वही घड़ी धन्य है जब सत्संग हो और वही जन्म धन्य है जिसमें द्विजों के प्रति अखण्ड भक्ति हो।
यह न कहिअ सठही हठसीलहि। जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि॥ कहिअ न लोभिहि क्रोधिहि कामिहि। जो न भजइ सचराचर स्वामिहि॥ २ ॥
अर्थ:
यह कथा उनसे न कहनी चाहिये जो शठ और हठी स्वभाव के हों तथा जो श्रीहरि की लीलाओं को मन लगाकर न सुनते हों। लोभी, क्रोधी और कामी को, जो चराचर के स्वामी को नहीं भजते, यह कथा नहीं कहनी चाहिये।
राम कथा गिरिजा मैं बरनी। कलि मल समनि मनोमल हरनी॥ संसृति रोग सजीवन मूरी। राम कथा गावहिं श्रुति सूरी॥ १ ॥
अर्थ:
हे गिरिजे! मैंने कलियुग के पापों का नाश करनेवाली और मन के मल को दूर करनेवाली रामकथा का वर्णन किया। यह रामकथा संसृति (जन्म-मरण)-रूपी रोग के [नाश के] लिये संजीवनी जड़ी है, वेद और विद्वान् पुरुष ऐसा कहते हैं।
मन कामना सिद्धि नर पावा। जे यह कथा कपट तजि गावा॥ कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं। ते गोपद इव भवनिधि तरहीं॥ ३ ॥
अर्थ:
जो कपट छोड़कर यह कथा गाते हैं, वे मनुष्य अपनी मनःकामना की सिद्धि पा लेते हैं। जो इसे कहते-सुनते और अनुमोदन (प्रशंसा) करते हैं, वे संसाररूपी समुद्र को गौ के खुर से बने हुए गड्डे की भाँति पार कर जाते हैं।
सुनि सब कथा हृदय अति भाई। गिरिजा बोली गिरा सुहाई॥ नाथ कृपाँ मम गत संदेहा। राम चरन उपजेउ नव नेहा॥ ४ ॥
अर्थ:
[याज्ञवल्क्यजी कहते हैं--] सब कथा सुनकर श्रीपार्वतीजी के हृदय को बहुत ही प्रिय लगी और वे सुन्दर वाणी बोलीं--स्वामी की कृपा से मेरा सन्देह जाता रहा और श्रीरामजी के चरणों में नवीन प्रेम उत्पन्न हो गया।
राम उपासक जे जग माहीं। एहि सम प्रिय तिन्ह कें कछु नाहीं॥ रघुपति कृपाँ जथामति गावा। मैं यह पावन चरित सुहावा॥ २ ॥
अर्थ:
जगत् में जो (जितने भी) रामोपासक हैं, उनको तो इस रामकथा के समान कुछ भी प्रिय नहीं है। श्रीरघुनाथजी की कृपा से मैंने यह सुन्दर और पवित्र करनेवाला चरित्र अपनी बुद्धि के अनुसार गाया है।
एहिं कलिकाल न साधन दूजा। जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा॥ रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि॥ ३ ॥
अर्थ:
इस कलिकाल में योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत और पूजन आदि कोई दूसरा साधन नहीं है। बस, श्रीरामजी का ही स्मरण करना, श्रीरामजी का ही गुण गाना और निरन्तर श्रीरामजी के ही गुणसमूहों को सुनना चाहिये।
पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना। गनिका अजामिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना॥ आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे। कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते॥ १ ॥
अर्थ:
अरे मूर्ख मन! सुन, पतितों को भी पावन करनेवाले श्रीराम को भजकर किसने परमगति नहीं पायी? गणिका, अजामिल, व्याध, गीध, गज आदि बहुत-से दुष्टों को उन्होंने तार दिया। आभीर, यवन, किरात, खस, स्वपच आदि जो अत्यन्त पापरूप ही हैं, वे भी केवल एक बार जिनका नाम लेकर पवित्र हो जाते हैं, उन श्रीरामजी को मैं नमस्कार करता हूँ।
रघुबंस भूषन चरित यह नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं। कलि मल मनोमल धोइ बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं॥ सत पंच चौपाईं मनोहर जानि जो नर उर धरै। दारुन अबिद्या पंच जनित बिकार श्री रघुबर हरै॥ २ ॥
अर्थ:
जो मनुष्य रघुवंश के भूषण श्रीरामजी का यह चरित्र कहते हैं, सुनते हैं और गाते हैं, वे कलियुग के पाप और मन के मल को धोकर बिना ही परिश्रम श्रीरामजी के परम धाम को चले जाते हैं। [ अधिक क्या] जो मनुष्य पाँच-सात चौपाइयों को भी मनोहर जानकर [अथवा रामायण की चौपाइयों को श्रेष्ठ पंच (कर्तव्याकर्तव्य का सच्चा निर्णायक) जानकर उनको] हृदय में धारण कर लेता है, उसके भी पाँच प्रकार की अविद्याओं से उत्पन्न विकारों को श्रीरामजी हरण कर लेते हैं। (अर्थात् सारे रामचरित्र की तो बात ही क्या है, जो पाँच-सात चौपाइयों को भी समझकर उनका अर्थ हृदय में धारण कर लेते हैं, उनके भी अविद्याजनित सारे क्लेश श्रीरामचन्द्रजी हर लेते हैं)।
सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो। सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को॥ जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ। पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ॥ ३ ॥
अर्थ:
सुन्दर, सुजान और कृपानिधान तथा जो अनाथों पर प्रेम करते हैं, ऐसे एक श्रीरामचन्द्रजी ही हैं। इनके समान निष्काम (निःस्वार्थ) हित करनेवाला और मोक्ष देनेवाला दूसरा कौन है? जिनकी लेशमात्र कृपा से मन्दबुद्धि तुलसीदास ने भी परम शान्ति प्राप्त कर ली, उन श्रीरामजी के समान प्रभु कहीं भी नहीं हैं।
यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं। श्रीमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशं प्राप्त्ये तु रामायणम्॥ मत्वा तद्रघुनाथनामनिरतं स्वान्तस्तमःशान्तये। भाषाबद्धमिदं चकार तुलसीदासस्तथा मानसम्॥ १ ॥
अर्थ:
श्रेष्ठ कवि भगवान् श्रीशंकरजी ने पहले जिस दुर्गम मानस-रामायण की, श्रीरामजी के चरणकमलों में नित्य-निरन्तर [अनन्य] भक्ति प्राप्त होने के लिये, रचना की थी, उस मानस-रामायण को श्रीरघुनाथजी के नाम में निरत मानकर अपने अन्तःकरण के अन्धकार को मिटाने के लिये तुलसीदास ने इस मानस के रूप में भाषाबद्ध किया।
पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानभक्तिप्रदं। मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूर शुभम्॥ श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं भक््त्यावगाहन्ति ये। ते संसारपतड्रघोरकिरणैर्दहान्ति नो मानवाः॥ २ ॥
अर्थ:
यह श्रीरामचरितमानस पुण्यरूप, पापों का हरण करनेवाला, सदा कल्याणकारी, विज्ञान और भक्ति को देनेवाला, माया, मोह और मल का नाश करनेवाला, परम निर्मल प्रेमरूपी जल से परिपूर्ण तथा मंगलमय है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस मानससरोवर में गोता लगाते हैं, वे संसाररूपी सूर्य की अति प्रचण्ड किरणों से नहीं जलते।