रामायण माहात्म्य, तुलसी विनय और फलस्तुति

यहाँ रामायण की महिमा कही गई है, फिर तुलसीदासजी अत्यंत विनयपूर्वक अपनी प्रार्थना अर्पित करते हैं। अंत में इसके श्रवण और पाठ से प्राप्त होने वाले पुण्य एवं कल्याण का वर्णन है।

उत्तरकाण्ड · प्रकरण २१ / २१

प्रकरण पाठ

चौपाई

कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा। ब्यास समास स्वमति अनुरूपा॥ श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी। राम भजिअ सब काज बिसारी॥ १ ॥

अर्थ:

हे नाथ! मैंने श्रीहरि का अनुपम चरित्र अपनी बुद्धि के अनुसार कहीं विस्तार से और कहीं संक्षेप से कहा। हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! श्रुतियों का यही सिद्धान्त है कि सब काम भुलाकर (छोड़कर) श्रीरामजी का भजन करना चाहिये।

चौपाई

प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही। मोहि से सठ पर ममता जाही॥ तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा। नाथ कीन्हि मो पर अति छोहा॥ २ ॥

अर्थ:

प्रभु श्रीरघुनाथजी को छोड़कर और किसका सेवन (भजन) किया जाय, जिनका मुझ जैसे मूर्ख पर भी ममत्व (स्नेह) है। हे नाथ! आप विज्ञान-रूप हैं, आपको मोह नहीं है। आपने तो मुझ पर बड़ी कृपा की है।

चौपाई

पूँछिहु राम कथा अति पावनि। सुक सनकादि संभु मन भावनि॥ सत संगति दुर्लभ संसारा। निमिष दंड भरि एकउ बारा॥ ३ ॥

अर्थ:

जो आपने मुझसे शुकदेवजी, सनकादि और शिवजी के मन को प्रिय लगनेवाली अति पवित्र रामकथा पूछी। संसार में घड़ीभर का अथवा पलभर का एक बार का भी सत्संग दुर्लभ है।

चौपाई

देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी। मैं रघुबीर भजन अधिकारी॥ सकुनाधम सब भाँति अपावन। प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन॥ ४ ॥

अर्थ:

हे गरुड़जी! अपने हृदय में विचारकर देखिये, क्या मैं भी श्रीरामजी के भजन का अधिकारी हूँ? पक्षियों में सबसे नीच और सब प्रकार से अपवित्र हूँ। परन्तु ऐसा होने पर भी प्रभु ने मुझको सारे जगत् को पवित्र करनेवाला प्रसिद्ध कर दिया [अथवा प्रभु ने मुझको जगत्प्रसिद्ध पावन कर दिया]।

दोहा

आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन। निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन॥ १२३ (क) ॥

अर्थ:

यद्यपि मैं सब प्रकार से हीन (नीच) हूँ, तो भी आज मैं धन्य हूँ, अत्यन्त धन्य हूँ, जो श्रीरामजी ने मुझे अपना “निज जन” जानकर संत-समागम दिया (आपसे मेरी भेंट करायी)।

दोहा

नाथ जथामति भाषेउँ राखेउँ नहिं कछु गोइ। चरित सिंधु रघुनायक थाह कि पावइ कोइ॥ १२३ (ख) ॥

अर्थ:

हे नाथ! मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार कहा, कुछ भी छिपा नहीं रखा। [फिर भी] श्रीरघुवीर के चरित्र समुद्र के समान हैं; क्या उनकी कोई थाह पा सकता है?

दोहा 124 के अंतर्गत
चौपाई

सुमिरि राम के गुन गन नाना। पुनि पुनि हरष भुसुंडि सुजाना॥ महिमा निगम नेति करि गाई। अतुलित बल प्रताप प्रभुताई॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के बहुत-से गुणसमूहों का स्मरण कर-करके सुजान भुशुण्डिजी बार-बार हर्षित हो रहे हैं। जिनकी महिमा वेदों ने 'नेति-नेति' कहकर गायी है; जिनका बल, प्रताप और प्रभुत्व (सामर्थ्य) अतुलनीय है;।

चौपाई

सिव अज पूज्य चरन रघुराई। मो पर कृपा परम मृदुलाई॥ अस सुभाउ कहुँ सुनउँ न देखउँ। केहि खगेस रघुपति सम लेखउँ॥ २ ॥

अर्थ:

जिन श्रीरघुनाथजी के चरण शिवजी और ब्रह्माजी के द्वारा पूज्य हैं, उनकी मुझ पर कृपा होना उनकी परम कोमलता है। किसी का ऐसा स्वभाव कहीं न सुनता हूँ, न देखता हूँ। अतः हे पक्षिराज गरुड़जी! मैं श्रीरघुनाथजी के समान किसे गिनूँ (समझूँ)?

चौपाई

साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी। कबि कोबिद कृतग्य संन्यासी॥ जोगी सूर सुतापस ग्यानी। धर्म निरत पंडित बिग्यानी॥ ३ ॥

अर्थ:

साधक, सिद्ध, जीवन्मुक्त, उदासीन (विरक्त), कवि, विद्वान, कृतज्ञ, संन्यासी, योगी, शूरवीर, बड़े तपस्वी, ज्ञानी, धर्मपरायण, पण्डित और विज्ञानी।

चौपाई

तरहिं न बिनु सेए मम स्वामी। राम नमामि नमामि नमामी॥ सरन गएँ मो से अघ रासी। होहिं सुद्ध नमामि अबिनासी॥ ४ ॥

अर्थ:

ये कोई भी मेरे स्वामी श्रीरामजी का सेवन (भजन) किये बिना नहीं तर सकते। मैं उन्हीं श्रीरामजी को बार-बार नमस्कार करता हूँ। जिनकी शरण जाने पर मुझ-जैसी पापराशि भी शुद्ध (पापरहित) हो जाते हैं, उन अविनाशी श्रीरामजी को मैं नमस्कार करता हूँ।

दोहा

जासु नाम भव भेषज हरन घोर त्रय सूल। सो कृपाल मोहि तो पर सदा रहउ अनुकूल॥ १२४ (क) ॥

अर्थ:

जिनका नाम जन्म-मरण रूपी रोग की औषधि है और जो घोर तीनों तापों को हरने वाले हैं, वे कृपालु मुझ पर सदा अनुकूल रहें।

दोहा

सुनि भुसुंडि के बचन सुभ देखि राम पद नेह। बोलेउ प्रेम सहित गिरा गरुड़ बिगत संदेह॥ १२४ (ख) ॥

अर्थ:

भुशुण्डिजी के मंगलमय वचन सुनकर और श्रीरामजी के चरणों में उनका अतिशय प्रेम देखकर सन्देह से भलीभाँति छूटे हुए गरुड़जी प्रेम सहित वचन बोले।

दोहा 125 के अंतर्गत
चौपाई

मैं कृतकृत्य भयउँ तव बानी। सुनि रघुबीर भगति रस सानी॥ राम चरन नूतन रति भई। माया जनित बिपति सब गई॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरघुबीर की भक्ति-रस में सनी हुई आपकी वाणी सुनकर मैं कृतकृत्य हो गया। श्रीरामजी के चरणों में मेरी नवीन प्रीति हो गयी और माया से उत्पन्न सारी विपत्ति चली गयी।

चौपाई

मोह जलधि बोहित तुम्ह भए। मो कहँ नाथ बिबिध सुख दए॥ मो पहिं होइ न प्रति उपकारा। बंदउँ तव पद बारहिं बारा॥ २ ॥

अर्थ:

मोह-जलधि में डूबते हुए मेरे लिये आप जहाज हुए। हे नाथ! आपने मुझे विविध सुख दिये। मुझ से इसका प्रत्युपकार नहीं हो सकता। मैं तो आपके चरणों की बार-बार वन्दना ही करता हूँ।

चौपाई

पूरन काम राम अनुरागी। तुम्ह सम तात न कोउ बड़भागी॥ संत बिटप सरिता गिरि धरनी। पर हित हेतु सबन्ह कै करनी॥ ३ ॥

अर्थ:

आप पूर्णकाम हैं और श्रीरामजी के अनुरागी हैं। हे तात! आपके समान कोई बड़भागी नहीं है। संत, वृक्ष, नदी, पर्वत और पृथ्वी—इन सबकी करनी परहित के लिये ही होती है।

चौपाई

संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना॥ निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता॥ ४ ॥

अर्थ:

संतों का हृदय मक्खन के समान होता है, ऐसा कवियों ने कहा है; परन्तु उन्होंने असली बात कहना नहीं जाना। मक्खन तो अपने ताप से पिघलता है और परम पवित्र संत दूसरों के दुःख से पिघल जाते हैं।

चौपाई

जीवन जन्म सुफल मम भयऊ। तव प्रसाद संसय सब गयऊ॥ जानेहु सदा मोहि निज किंकर। पुनि पुनि उमा कहइ बिहंगबर॥ ५ ॥

अर्थ:

मेरा जीवन और जन्म सफल हो गया। आपकी कृपा से सब संदेह चला गया। मुझे सदा अपना किंकर ही जानिए। [शिवजी कहते हैं—] हे उमा! पक्षिश्रेष्ठ गरुड़जी बार-बार ऐसा कह रहे हैं।

दोहा

तासु चरन सिरु नाइ करि प्रेम सहित मतिधीर। गयउ गरुड़ बैकुंठ तब हृदयँ राखि रघुबीर॥ १२५ (क) ॥

अर्थ:

उन (भुशुण्डिजी) के चरणों में प्रेमसहित सिर नवाकर और हृदय में श्रीरघुबीर को धारण करके धीरबुद्धि गरुड़जी तब वैकुण्ठ को चले गये।

दोहा

गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन। बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान॥ १२५ (ख) ॥

अर्थ:

हे गिरिजे! संत-समागम के समान दूसरा कोई लाभ नहीं है। पर वह (संत-समागम) श्रीहरि की कृपा के बिना नहीं हो सकता, ऐसा वेद और पुराण गाते हैं।

दोहा 126 के अंतर्गत
चौपाई

कहेउँ परम पुनीत इतिहासा। सुनत श्रवन छूटहिं भव पासा॥ प्रनत कल्पतरु करुना पुंजा। उपजइ प्रीति राम पद कंजा॥ १ ॥

अर्थ:

मैंने यह परम पवित्र इतिहास कहा, जिसे सुनते ही कानों से भवपाश छूट जाते हैं और शरणागतों के लिये कल्पतरु तथा करुणापुंज श्रीरामजी के चरणकमलों में प्रेम उत्पन्न होता है।

चौपाई

मन क्रम बचन जनित अघ जाई। सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई॥ तीर्थाटन साधन समुदाई। जोग बिराग ग्यान निपुनाई॥ २ ॥

अर्थ:

जो कान और मन लगाकर इस कथा को सुनते हैं, उनके मन, वचन और कर्म से उत्पन्न सब पाप नष्ट हो जाते हैं। तीर्थाटन, साधन-समुदाय, योग, वैराग्य और ज्ञान में निपुणता—

चौपाई

नाना कर्म धर्म ब्रत दाना। संजम दम जप तप मख नाना॥ भूत दया द्विज गुर सेवकाई। बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई॥ ३ ॥

अर्थ:

अनेक प्रकार के कर्म, धर्म, व्रत और दान, अनेक संयम, दम, जप, तप और यज्ञ, प्राणियों पर दया, ब्राह्मण और गुरु की सेवाकाई; विद्या, विनय और विवेक की बड़ाई—

चौपाई

जहँ लगि साधन बेद बखानी। सब कर फल हरि भगति भवानी॥ सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई। राम कृपाँ काहूँ एक पाई॥ ४ ॥

अर्थ:

जहाँ तक वेदों ने साधन बतलाये हैं, हे भवानी! उन सबका फल हरि-भक्ति ही है। पर श्रुतियों में गायी हुई वह श्रीरघुनाथजी की भक्ति श्रीरामजी की कृपा से किसी एक ने ही पायी है।

दोहा

मुनि दुर्लभ हरि भगति नर पावहिं बिनहिं प्रयास। जे यह कथा निरंतर सुनहिं मानि बिस्वास॥ १२६ ॥

अर्थ:

किन्तु जो मनुष्य विश्वास मानकर यह कथा निरन्तर सुनते हैं, वे बिना ही परिश्रम मुनि-दुर्लभ हरि-भक्ति को प्राप्त कर लेते हैं।

दोहा 127 के अंतर्गत
चौपाई

सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता॥ धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता॥ १ ॥

अर्थ:

जिसका मन श्रीरामजी के चरणों में अनुरक्त है, वही सर्वज्ञ है, वही गुणी है, वही ज्ञाता है। वही पृथ्वी का भूषण, पण्डित और दानी है। वही धर्मपरायण है और वही कुल का रक्षक है।

चौपाई

नीति निपुन सोइ परम सयाना। श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना॥ सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा। जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा॥ २ ॥

अर्थ:

जो छल छोड़कर श्रीरघुवीर का भजन करता है, वही नीति में निपुण है, वही परम बुद्धिमान् है। उसी ने वेदों के सिद्धान्त को भलीभाँति जाना है। वही कवि, वही विद्वान् तथा वही रणधीर है।

चौपाई

धन्य देस सो जहँ सुरसरी। धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी॥ धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई॥ ३ ॥

अर्थ:

वह देश धन्य है जहाँ सुरसरी है। वह स्त्री धन्य है जो पातिव्रत का पालन करती है। वह राजा धन्य है जो नीति करता है और वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से नहीं डिगता।

चौपाई

सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी॥ धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा॥ ४ ॥

अर्थ:

वह धन धन्य है जिसकी पहली गति दान में होती है। वही बुद्धि धन्य और परिपक्व है जो पुण्य में रत है। वही घड़ी धन्य है जब सत्संग हो और वही जन्म धन्य है जिसमें द्विजों के प्रति अखण्ड भक्ति हो।

दोहा

सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत। श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत॥ १२७ ॥

अर्थ:

हे उमा! सुनो। वह कुल धन्य है, संसारभर के लिए पूज्य है और परम पवित्र है, जिसमें श्रीरघुवीर-परायण विनीत पुरुष उत्पन्न हो।

दोहा 128 के अंतर्गत
चौपाई

मति अनुरूप कथा मैं भाषी। जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी॥ तव मन प्रीति देखि अधिकाई। तब मैं रघुपति कथा सुनाई॥ १ ॥

अर्थ:

मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार यह कथा कही, यद्यपि पहले इसे छिपाकर रखा था। तुम्हारे मन में प्रीति की अधिकता देखकर तब मैंने श्रीरघुपति की कथा सुनाई।

चौपाई

यह न कहिअ सठही हठसीलहि। जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि॥ कहिअ न लोभिहि क्रोधिहि कामिहि। जो न भजइ सचराचर स्वामिहि॥ २ ॥

अर्थ:

यह कथा उनसे न कहनी चाहिये जो शठ और हठी स्वभाव के हों तथा जो श्रीहरि की लीलाओं को मन लगाकर न सुनते हों। लोभी, क्रोधी और कामी को, जो चराचर के स्वामी को नहीं भजते, यह कथा नहीं कहनी चाहिये।

चौपाई

द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ। सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ॥ राम कथा के तेइ अधिकारी। जिन्ह कें सत संगति अति प्यारी॥ ३ ॥

अर्थ:

ब्राह्मणों के द्रोही को कभी नहीं सुनानी चाहिये, चाहे वह देवराज के समान हो या राजा हो। श्रीराम की कथा के अधिकारी वे ही हैं जिनको सत्संगति अत्यन्त प्रिय है।

चौपाई

गुर पद प्रीति नीति रत जेई। द्विज सेवक अधिकारी तेई॥ ता कहँ यह बिसेष सुखदाई। जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई॥ ४ ॥

अर्थ:

जिनकी गुरु के चरणों में प्रीति है, जो नीति परायण हैं और ब्राह्मणों के सेवक हैं, वे ही इसके अधिकारी हैं, और उनको तो यह कथा बहुत सुख देनेवाली है, जिनको श्रीरघुराई प्राणप्रिय हैं।

दोहा

राम चरन रति जो चह अथवा पद निर्बान। भाव सहित सो यह कथा करउ श्रवन पुट पान॥ १२८ ॥

अर्थ:

जो श्रीरामजी के चरणों में प्रेम चाहता हो या मोक्षपद चाहता हो, वह इस कथारूपी अमृत को भाव सहित अपने कानों के पुट से पिये।

दोहा 129 के अंतर्गत
चौपाई

राम कथा गिरिजा मैं बरनी। कलि मल समनि मनोमल हरनी॥ संसृति रोग सजीवन मूरी। राम कथा गावहिं श्रुति सूरी॥ १ ॥

अर्थ:

हे गिरिजे! मैंने कलियुग के पापों का नाश करनेवाली और मन के मल को दूर करनेवाली रामकथा का वर्णन किया। यह रामकथा संसृति (जन्म-मरण)-रूपी रोग के [नाश के] लिये संजीवनी जड़ी है, वेद और विद्वान् पुरुष ऐसा कहते हैं।

चौपाई

एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना। रघुपति भगति केर पंथाना॥ अति हरि कृपा जाहि पर होई। पाउँ देइ एहिं मारग सोई॥ २ ॥

अर्थ:

इसमें सात सुन्दर सीढ़ियाँ हैं, जो श्रीरघुनाथजी की भक्ति को प्राप्त करने के मार्ग हैं। जिस पर श्रीहरि की अत्यन्त कृपा होती है, वही इस मार्ग पर पैर रखता है।

चौपाई

मन कामना सिद्धि नर पावा। जे यह कथा कपट तजि गावा॥ कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं। ते गोपद इव भवनिधि तरहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

जो कपट छोड़कर यह कथा गाते हैं, वे मनुष्य अपनी मनःकामना की सिद्धि पा लेते हैं। जो इसे कहते-सुनते और अनुमोदन (प्रशंसा) करते हैं, वे संसाररूपी समुद्र को गौ के खुर से बने हुए गड्डे की भाँति पार कर जाते हैं।

चौपाई

सुनि सब कथा हृदय अति भाई। गिरिजा बोली गिरा सुहाई॥ नाथ कृपाँ मम गत संदेहा। राम चरन उपजेउ नव नेहा॥ ४ ॥

अर्थ:

[याज्ञवल्क्यजी कहते हैं--] सब कथा सुनकर श्रीपार्वतीजी के हृदय को बहुत ही प्रिय लगी और वे सुन्दर वाणी बोलीं--स्वामी की कृपा से मेरा सन्देह जाता रहा और श्रीरामजी के चरणों में नवीन प्रेम उत्पन्न हो गया।

दोहा

मैं कृतकृत्य भइउँ अब तव प्रसाद बिस्वेस। उपजी राम भगति दृढ़ बीते सकल कलेस॥ १२९ ॥

अर्थ:

हे विश्वनाथ! आपकी कृपा से अब मैं कृतार्थ हो गई। मुझमें दृढ़ रामभक्ति उत्पन्न हो गई और मेरे सम्पूर्ण क्लेश बीत गये (नष्ट हो गये)।

दोहा 130 के अंतर्गत
चौपाई

यह सुभ संभु उमा संबादा। सुख संपादन समन बिषादा॥ भव भंजन गंजन संदेहा। जन रंजन सज्जन प्रिय एहा॥ १ ॥

अर्थ:

शम्भु-उमा का यह कल्याणकारी संवाद सुख उत्पन्न करनेवाला और शोक का नाश करनेवाला है। जन्म-मरण का अन्त करनेवाला, सन्देहों का नाश करनेवाला, भक्तों को आनन्द देनेवाला और संत पुरुषों को प्रिय है।

चौपाई

राम उपासक जे जग माहीं। एहि सम प्रिय तिन्ह कें कछु नाहीं॥ रघुपति कृपाँ जथामति गावा। मैं यह पावन चरित सुहावा॥ २ ॥

अर्थ:

जगत् में जो (जितने भी) रामोपासक हैं, उनको तो इस रामकथा के समान कुछ भी प्रिय नहीं है। श्रीरघुनाथजी की कृपा से मैंने यह सुन्दर और पवित्र करनेवाला चरित्र अपनी बुद्धि के अनुसार गाया है।

चौपाई

एहिं कलिकाल न साधन दूजा। जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा॥ रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि॥ ३ ॥

अर्थ:

इस कलिकाल में योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत और पूजन आदि कोई दूसरा साधन नहीं है। बस, श्रीरामजी का ही स्मरण करना, श्रीरामजी का ही गुण गाना और निरन्तर श्रीरामजी के ही गुणसमूहों को सुनना चाहिये।

चौपाई

जासु पतित पावन बड़ बाना। गावहिं कबि श्रुति संत पुराना॥ ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई। राम भजें गति केहिं नहिं पाई॥ ४ ॥

अर्थ:

पतितों को पवित्र करना जिनका महान् (प्रसिद्ध) बाना है—ऐसा कवि, वेद, संत और पुराण गाते हैं। रे मन! कुटिलता त्यागकर उन्हीं को भज। श्रीराम को भजने से किसने परम गति नहीं पायी?

छन्द

पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना। गनिका अजामिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना॥ आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे। कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते॥ १ ॥

अर्थ:

अरे मूर्ख मन! सुन, पतितों को भी पावन करनेवाले श्रीराम को भजकर किसने परमगति नहीं पायी? गणिका, अजामिल, व्याध, गीध, गज आदि बहुत-से दुष्टों को उन्होंने तार दिया। आभीर, यवन, किरात, खस, स्वपच आदि जो अत्यन्त पापरूप ही हैं, वे भी केवल एक बार जिनका नाम लेकर पवित्र हो जाते हैं, उन श्रीरामजी को मैं नमस्कार करता हूँ।

छन्द

रघुबंस भूषन चरित यह नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं। कलि मल मनोमल धोइ बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं॥ सत पंच चौपाईं मनोहर जानि जो नर उर धरै। दारुन अबिद्या पंच जनित बिकार श्री रघुबर हरै॥ २ ॥

अर्थ:

जो मनुष्य रघुवंश के भूषण श्रीरामजी का यह चरित्र कहते हैं, सुनते हैं और गाते हैं, वे कलियुग के पाप और मन के मल को धोकर बिना ही परिश्रम श्रीरामजी के परम धाम को चले जाते हैं। [ अधिक क्या] जो मनुष्य पाँच-सात चौपाइयों को भी मनोहर जानकर [अथवा रामायण की चौपाइयों को श्रेष्ठ पंच (कर्तव्याकर्तव्य का सच्चा निर्णायक) जानकर उनको] हृदय में धारण कर लेता है, उसके भी पाँच प्रकार की अविद्याओं से उत्पन्न विकारों को श्रीरामजी हरण कर लेते हैं। (अर्थात् सारे रामचरित्र की तो बात ही क्या है, जो पाँच-सात चौपाइयों को भी समझकर उनका अर्थ हृदय में धारण कर लेते हैं, उनके भी अविद्याजनित सारे क्लेश श्रीरामचन्द्रजी हर लेते हैं)।

छन्द

सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो। सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को॥ जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ। पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ॥ ३ ॥

अर्थ:

सुन्दर, सुजान और कृपानिधान तथा जो अनाथों पर प्रेम करते हैं, ऐसे एक श्रीरामचन्द्रजी ही हैं। इनके समान निष्काम (निःस्वार्थ) हित करनेवाला और मोक्ष देनेवाला दूसरा कौन है? जिनकी लेशमात्र कृपा से मन्दबुद्धि तुलसीदास ने भी परम शान्ति प्राप्त कर ली, उन श्रीरामजी के समान प्रभु कहीं भी नहीं हैं।

दोहा

मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर। अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर॥ १३० (क) ॥

अर्थ:

हे श्रीरघुवीर! मेरे समान कोई दीन नहीं है और आपके समान कोई दीनों का हित करनेवाला नहीं है। ऐसा विचारकर हे रघुवंशमणि! मेरे जन्म-मरण के भयानक दुःख का हरण कर लीजिये।

दोहा

कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम। तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥ १३० (ख) ॥

अर्थ:

जैसे कामी को स्त्री प्रिय लगती है और लोभी को जैसे धन प्यारा लगता है, वैसे ही हे रघुनाथजी! हे रामजी! आप निरन्तर मुझे प्रिय लगिये।

श्लोक

यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं। श्रीमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशं प्राप्त्ये तु रामायणम्‌॥ मत्वा तद्रघुनाथनामनिरतं स्वान्तस्तमःशान्तये। भाषाबद्धमिदं चकार तुलसीदासस्तथा मानसम्‌॥ १ ॥

अर्थ:

श्रेष्ठ कवि भगवान् श्रीशंकरजी ने पहले जिस दुर्गम मानस-रामायण की, श्रीरामजी के चरणकमलों में नित्य-निरन्तर [अनन्य] भक्ति प्राप्त होने के लिये, रचना की थी, उस मानस-रामायण को श्रीरघुनाथजी के नाम में निरत मानकर अपने अन्तःकरण के अन्धकार को मिटाने के लिये तुलसीदास ने इस मानस के रूप में भाषाबद्ध किया।

श्लोक

पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानभक्तिप्रदं। मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूर शुभम्‌॥ श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं भक्‍्त्यावगाहन्ति ये। ते संसारपतड्रघोरकिरणैर्दहान्ति नो मानवाः॥ २ ॥

अर्थ:

यह श्रीरामचरितमानस पुण्यरूप, पापों का हरण करनेवाला, सदा कल्याणकारी, विज्ञान और भक्ति को देनेवाला, माया, मोह और मल का नाश करनेवाला, परम निर्मल प्रेमरूपी जल से परिपूर्ण तथा मंगलमय है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस मानससरोवर में गोता लगाते हैं, वे संसाररूपी सूर्य की अति प्रचण्ड किरणों से नहीं जलते।