मोह जलधि बोहित तुम्ह भए
मोह जलधि बोहित तुम्ह भए
चौपाई २, दोहा १२५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
मोह जलधि बोहित तुम्ह भए। मो कहँ नाथ बिबिध सुख दए॥ मो पहिं होइ न प्रति उपकारा। बंदउँ तव पद बारहिं बारा॥ २ ॥
अर्थ
मोह-जलधि में डूबते हुए मेरे लिये आप जहाज हुए। हे नाथ! आपने मुझे विविध सुख दिये। मुझ से इसका प्रत्युपकार नहीं हो सकता। मैं तो आपके चरणों की बार-बार वन्दना ही करता हूँ।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १२५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।
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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति