यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं
यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं
श्लोक १, दोहा १३० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
श्लोक पाठ
यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं। श्रीमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशं प्राप्त्ये तु रामायणम्॥ मत्वा तद्रघुनाथनामनिरतं स्वान्तस्तमःशान्तये। भाषाबद्धमिदं चकार तुलसीदासस्तथा मानसम्॥ १ ॥
अर्थ
श्रेष्ठ कवि भगवान् श्रीशंकरजी ने पहले जिस दुर्गम मानस-रामायण की, श्रीरामजी के चरणकमलों में नित्य-निरन्तर [अनन्य] भक्ति प्राप्त होने के लिये, रचना की थी, उस मानस-रामायण को श्रीरघुनाथजी के नाम में निरत मानकर अपने अन्तःकरण के अन्धकार को मिटाने के लिये तुलसीदास ने इस मानस के रूप में भाषाबद्ध किया।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का श्लोक १, दोहा १३० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।
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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति