मन क्रम बचन जनित अघ जाई

चौपाई २, दोहा १२६ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

मन क्रम बचन जनित अघ जाई। सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई॥ तीर्थाटन साधन समुदाई। जोग बिराग ग्यान निपुनाई॥ २ ॥

अर्थ

जो कान और मन लगाकर इस कथा को सुनते हैं, उनके मन, वचन और कर्म से उत्पन्न सब पाप नष्ट हो जाते हैं। तीर्थाटन, साधन-समुदाय, योग, वैराग्य और ज्ञान में निपुणता—

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १२६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।

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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति