साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी
साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी
चौपाई ३, दोहा १२४ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी। कबि कोबिद कृतग्य संन्यासी॥ जोगी सूर सुतापस ग्यानी। धर्म निरत पंडित बिग्यानी॥ ३ ॥
अर्थ
साधक, सिद्ध, जीवन्मुक्त, उदासीन (विरक्त), कवि, विद्वान, कृतज्ञ, संन्यासी, योगी, शूरवीर, बड़े तपस्वी, ज्ञानी, धर्मपरायण, पण्डित और विज्ञानी।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १२४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।
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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति