सो धन धन्य प्रथम गति जाकी
सो धन धन्य प्रथम गति जाकी
चौपाई ४, दोहा १२७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी॥ धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा॥ ४ ॥
अर्थ
वह धन धन्य है जिसकी पहली गति दान में होती है। वही बुद्धि धन्य और परिपक्व है जो पुण्य में रत है। वही घड़ी धन्य है जब सत्संग हो और वही जन्म धन्य है जिसमें द्विजों के प्रति अखण्ड भक्ति हो।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १२७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
रामायण माहात्म्य और फलस्तुति