मति अनुरूप कथा मैं भाषी
मति अनुरूप कथा मैं भाषी
चौपाई १, दोहा १२८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
मति अनुरूप कथा मैं भाषी। जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी॥ तव मन प्रीति देखि अधिकाई। तब मैं रघुपति कथा सुनाई॥ १ ॥
अर्थ
मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार यह कथा कही, यद्यपि पहले इसे छिपाकर रखा था। तुम्हारे मन में प्रीति की अधिकता देखकर तब मैंने श्रीरघुपति की कथा सुनाई।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १२८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।
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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति