नाना कर्म धर्म ब्रत दाना
नाना कर्म धर्म ब्रत दाना
चौपाई ३, दोहा १२६ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
नाना कर्म धर्म ब्रत दाना। संजम दम जप तप मख नाना॥ भूत दया द्विज गुर सेवकाई। बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई॥ ३ ॥
अर्थ
अनेक प्रकार के कर्म, धर्म, व्रत और दान, अनेक संयम, दम, जप, तप और यज्ञ, प्राणियों पर दया, ब्राह्मण और गुरु की सेवाकाई; विद्या, विनय और विवेक की बड़ाई—
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १२६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।
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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति