राम कथा गिरिजा मैं बरनी

चौपाई १, दोहा १२९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

राम कथा गिरिजा मैं बरनी। कलि मल समनि मनोमल हरनी॥ संसृति रोग सजीवन मूरी। राम कथा गावहिं श्रुति सूरी॥ १ ॥

अर्थ

हे गिरिजे! मैंने कलियुग के पापों का नाश करनेवाली और मन के मल को दूर करनेवाली रामकथा का वर्णन किया। यह रामकथा संसृति (जन्म-मरण)-रूपी रोग के [नाश के] लिये संजीवनी जड़ी है, वेद और विद्वान् पुरुष ऐसा कहते हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १२९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।

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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति