धन्य देस सो जहँ सुरसरी

चौपाई ३, दोहा १२७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

धन्य देस सो जहँ सुरसरी। धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी॥ धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई॥ ३ ॥

अर्थ

वह देश धन्य है जहाँ सुरसरी है। वह स्त्री धन्य है जो पातिव्रत का पालन करती है। वह राजा धन्य है जो नीति करता है और वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से नहीं डिगता।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १२७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।

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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति