कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा

चौपाई १, दोहा १२३ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा। ब्यास समास स्वमति अनुरूपा॥ श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी। राम भजिअ सब काज बिसारी॥ १ ॥

अर्थ

हे नाथ! मैंने श्रीहरि का अनुपम चरित्र अपनी बुद्धि के अनुसार कहीं विस्तार से और कहीं संक्षेप से कहा। हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! श्रुतियों का यही सिद्धान्त है कि सब काम भुलाकर (छोड़कर) श्रीरामजी का भजन करना चाहिये।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १२३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।

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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति