संत हृदय नवनीत समाना
संत हृदय नवनीत समाना
चौपाई ४, दोहा १२५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना॥ निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता॥ ४ ॥
अर्थ
संतों का हृदय मक्खन के समान होता है, ऐसा कवियों ने कहा है; परन्तु उन्होंने असली बात कहना नहीं जाना। मक्खन तो अपने ताप से पिघलता है और परम पवित्र संत दूसरों के दुःख से पिघल जाते हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १२५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
रामायण माहात्म्य और फलस्तुति