भजन महिमा

प्रभु के नाम, स्मरण और भजन की महिमा का अत्यंत सरस वर्णन मिलता है। बताया गया है कि सच्चे प्रेम से किया गया भजन जीव को भवसागर से पार लगाने वाला है।

उत्तरकाण्ड · प्रकरण २० / २१

प्रकरण पाठ

चौपाई

एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी॥ मानस रोग कछुक मैं गाए। हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए॥ १ ॥

अर्थ:

इस प्रकार जगत् में समस्त जीव रोगी हैं, जो शोक, हर्ष, भय, प्रीति और वियोग के दुःख से और भी दुखी हो रहे हैं। मैंने ये थोड़े-से मानस-रोग कहे हैं। ये हैं तो सबको, परन्तु इन्हें जान पाए हैं कोई विरले ही।

चौपाई

जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिं जन परितापी॥ बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे॥ २ ॥

अर्थ:

प्राणियों को जलाने वाले ये पापी (रोग) जान लिये जाने से कुछ क्षीण अवश्य हो जाते हैं, परन्तु नाश को नहीं प्राप्त होते। विषय-रूप कुपथ्य पाकर ये मुनियों के हृदय में भी अंकुरित हो उठते हैं, तब बेचारे साधारण मनुष्य तो क्या चीज हैं।

चौपाई

राम कृपाँ नासहिं सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संजोगा॥ सदगुर बैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय कै आसा॥ ३ ॥

अर्थ:

यदि श्रीरामजी की कृपा से इस प्रकार का संयोग बन जाय तो ये सब रोग नष्ट हो जायँ। सद्गुरु-रूपी वैद्य के वचन में विश्वास हो। विषयों की आशा न करे, यही संयम (परहेज) हो।

चौपाई

रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी॥ एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी की भक्ति संजीवनी जड़ी है। श्रद्धा से पूर्ण बुद्धि ही अनुपान (दवा के साथ लिया जानेवाला मधु आदि) है। इस प्रकार का संयोग हो तो वे रोग भले ही नष्ट हो जाएँ, नहीं तो करोड़ों प्रयत्नों से भी नहीं जाते।

चौपाई

जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई। जब उर बल बिराग अधिकाई॥ सुमति छुधा बाढ़इ नित नई। बिषय आस दुर्बलता गई॥ ५ ॥

अर्थ:

हे गोसाईं! मन को नीरोग हुआ तब जानना चाहिये, जब हृदय में वैराग्य का बल बढ़ जाय, उत्तम बुद्धि-रूपी भूख नित नयी बढ़ती रहे और विषयों की आशा-रूपी दुर्बलता मिट जाय।

चौपाई

बिमल ग्यान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छाई॥ सिव अज सुक सनकादिक नारद। जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद॥ ६ ॥

अर्थ:

निर्मल ज्ञान-रूपी जल में स्नान कर लेने पर तब उसके हृदय में रामभक्ति छा जाती है। शिवजी, ब्रह्माजी, शुकदेवजी, सनकादि और नारद आदि ब्रह्मविचार में परम निपुण जो मुनि हैं।

चौपाई

सब कर मत खगनायक एहा। करिअ राम पद पंकज नेहा॥ श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं। रघुपति भगति बिना सुख नाहीं॥ ७ ॥

अर्थ:

हे पक्षिराज! उन सबका मत यही है कि श्रीरामजी के चरणकमलों में प्रेम करना चाहिये। श्रुति, पुराण और सभी ग्रंथ कहते हैं कि श्रीरघुनाथजी की भक्ति के बिना सुख नहीं है।

चौपाई

कमठ पीठ जामहिं बरु बारा। बंध्यासुत बरु काहुहि मारा॥ फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला। जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला॥ ८ ॥

अर्थ:

कछुए की पीठ पर भले ही बाल उग आवें, बाँझ का पुत्र भले ही किसी को मार डाले, आकाश में भले ही अनेकों प्रकार के फूल खिल उठें; परन्तु श्रीहरि से विमुख होकर जीव सुख नहीं प्राप्त कर सकता।

चौपाई

तृषा जाइ बरु मृगजल पाना। बरु जामहिं सस सीस बिषाना॥ अंधकारु बरु रबिहि नसावै। राम बिमुख न जीव सुख पावै॥ ९ ॥

अर्थ:

मृगतृष्णा के जल को पीने से भले ही प्यास बुझ जाय, खरगोश के सिर पर भले ही सींग निकल आवें, अंधकार भले ही सूर्य का नाश कर दे; परन्तु श्रीराम से विमुख होकर जीव सुख नहीं पा सकता।

चौपाई

हिम ते अनल प्रगट बरु होई। बिमुख राम सुख पाव न कोई॥ १० ॥

अर्थ:

बर्फ से भले ही अग्नि प्रकट हो जाय, परन्तु श्रीराम से विमुख होकर कोई भी सुख नहीं पा सकता।

दोहा

बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल। बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल॥ १२२ (क) ॥

अर्थ:

जल को मथने से भले ही घी उत्पन्न हो जाय और बालू को पेरने से भले ही तेल निकल आवे; परन्तु श्रीहरि के भजन बिना संसाररूपी समुद्र से नहीं तर जा सकता, यह सिद्धान्त अटल है।

दोहा

मसकहि करइ बिरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन। अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन॥ १२२ (ख) ॥

अर्थ:

प्रभु ब्रह्मा को मच्छर कर सकते हैं और ब्रह्मा को मच्छर से भी तुच्छ बना सकते हैं। ऐसा विचारकर चतुर पुरुष सब सन्देह त्यागकर श्रीरामजी को ही भजते हैं।

श्लोक

विनिश्चितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे। हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते॥ १२२ (ग) ॥

अर्थ:

मैं आपसे भलीभाँति निश्चित किया हुआ सिद्धान्त कहता हूँ—मेरे वचन अन्यथा (मिथ्या) नहीं हैं कि जो मनुष्य श्रीहरि का भजन करते हैं, वे अत्यन्त दुस्तर संसारसागर को पार कर जाते हैं।