तरहिं न बिनु सेए मम स्वामी

चौपाई ४, दोहा १२४ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

तरहिं न बिनु सेए मम स्वामी। राम नमामि नमामि नमामी॥ सरन गएँ मो से अघ रासी। होहिं सुद्ध नमामि अबिनासी॥ ४ ॥

अर्थ

ये कोई भी मेरे स्वामी श्रीरामजी का सेवन (भजन) किये बिना नहीं तर सकते। मैं उन्हीं श्रीरामजी को बार-बार नमस्कार करता हूँ। जिनकी शरण जाने पर मुझ-जैसी पापराशि भी शुद्ध (पापरहित) हो जाते हैं, उन अविनाशी श्रीरामजी को मैं नमस्कार करता हूँ।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १२४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।

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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति