गुर पद प्रीति नीति रत जेई

चौपाई ४, दोहा १२८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

गुर पद प्रीति नीति रत जेई। द्विज सेवक अधिकारी तेई॥ ता कहँ यह बिसेष सुखदाई। जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई॥ ४ ॥

अर्थ

जिनकी गुरु के चरणों में प्रीति है, जो नीति परायण हैं और ब्राह्मणों के सेवक हैं, वे ही इसके अधिकारी हैं, और उनको तो यह कथा बहुत सुख देनेवाली है, जिनको श्रीरघुराई प्राणप्रिय हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १२८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।

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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति