पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं
पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं
श्लोक २, दोहा १३० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
श्लोक पाठ
पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानभक्तिप्रदं। मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूर शुभम्॥ श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं भक््त्यावगाहन्ति ये। ते संसारपतड्रघोरकिरणैर्दहान्ति नो मानवाः॥ २ ॥
अर्थ
यह श्रीरामचरितमानस पुण्यरूप, पापों का हरण करनेवाला, सदा कल्याणकारी, विज्ञान और भक्ति को देनेवाला, माया, मोह और मल का नाश करनेवाला, परम निर्मल प्रेमरूपी जल से परिपूर्ण तथा मंगलमय है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस मानससरोवर में गोता लगाते हैं, वे संसाररूपी सूर्य की अति प्रचण्ड किरणों से नहीं जलते।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का श्लोक २, दोहा १३० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।
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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति