मो सम दीन न दीन हित
मो सम दीन न दीन हित
दोहा १३० (क) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर। अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर॥ १३० (क) ॥
अर्थ
हे श्रीरघुवीर! मेरे समान कोई दीन नहीं है और आपके समान कोई दीनों का हित करनेवाला नहीं है। ऐसा विचारकर हे रघुवंशमणि! मेरे जन्म-मरण के भयानक दुःख का हरण कर लीजिये।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का दोहा १३० (क) है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।
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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति