मुनि दुर्लभ हरि भगति नर पावहिं
मुनि दुर्लभ हरि भगति नर पावहिं
दोहा १२६ · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
मुनि दुर्लभ हरि भगति नर पावहिं बिनहिं प्रयास। जे यह कथा निरंतर सुनहिं मानि बिस्वास॥ १२६ ॥
अर्थ
किन्तु जो मनुष्य विश्वास मानकर यह कथा निरन्तर सुनते हैं, वे बिना ही परिश्रम मुनि-दुर्लभ हरि-भक्ति को प्राप्त कर लेते हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का दोहा १२६ है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।
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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति