देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी

चौपाई ४, दोहा १२३ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी। मैं रघुबीर भजन अधिकारी॥ सकुनाधम सब भाँति अपावन। प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन॥ ४ ॥

अर्थ

हे गरुड़जी! अपने हृदय में विचारकर देखिये, क्या मैं भी श्रीरामजी के भजन का अधिकारी हूँ? पक्षियों में सबसे नीच और सब प्रकार से अपवित्र हूँ। परन्तु ऐसा होने पर भी प्रभु ने मुझको सारे जगत् को पवित्र करनेवाला प्रसिद्ध कर दिया [अथवा प्रभु ने मुझको जगत्प्रसिद्ध पावन कर दिया]।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १२३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।

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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति