जासु पतित पावन बड़ बाना
जासु पतित पावन बड़ बाना
चौपाई ४, दोहा १३० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
जासु पतित पावन बड़ बाना। गावहिं कबि श्रुति संत पुराना॥ ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई। राम भजें गति केहिं नहिं पाई॥ ४ ॥
अर्थ
पतितों को पवित्र करना जिनका महान् (प्रसिद्ध) बाना है—ऐसा कवि, वेद, संत और पुराण गाते हैं। रे मन! कुटिलता त्यागकर उन्हीं को भज। श्रीराम को भजने से किसने परम गति नहीं पायी?
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १३० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।
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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति