मैं कृतकृत्य भयउँ तव बानी
मैं कृतकृत्य भयउँ तव बानी
चौपाई १, दोहा १२५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
मैं कृतकृत्य भयउँ तव बानी। सुनि रघुबीर भगति रस सानी॥ राम चरन नूतन रति भई। माया जनित बिपति सब गई॥ १ ॥
अर्थ
श्रीरघुबीर की भक्ति-रस में सनी हुई आपकी वाणी सुनकर मैं कृतकृत्य हो गया। श्रीरामजी के चरणों में मेरी नवीन प्रीति हो गयी और माया से उत्पन्न सारी विपत्ति चली गयी।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १२५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।
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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति