नाथ जथामति भाषेउँ राखेउँ नहिं कछु
नाथ जथामति भाषेउँ राखेउँ नहिं कछु
दोहा १२३ (ख) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
नाथ जथामति भाषेउँ राखेउँ नहिं कछु गोइ। चरित सिंधु रघुनायक थाह कि पावइ कोइ॥ १२३ (ख) ॥
अर्थ
हे नाथ! मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार कहा, कुछ भी छिपा नहीं रखा। [फिर भी] श्रीरघुवीर के चरित्र समुद्र के समान हैं; क्या उनकी कोई थाह पा सकता है?
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का दोहा १२३ (ख) है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।
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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति