एहिं कलिकाल न साधन दूजा

चौपाई ३, दोहा १३० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

एहिं कलिकाल न साधन दूजा। जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा॥ रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि॥ ३ ॥

अर्थ

इस कलिकाल में योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत और पूजन आदि कोई दूसरा साधन नहीं है। बस, श्रीरामजी का ही स्मरण करना, श्रीरामजी का ही गुण गाना और निरन्तर श्रीरामजी के ही गुणसमूहों को सुनना चाहिये।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १३० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।

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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति