राम चरन रति जो चह अथवा
राम चरन रति जो चह अथवा
दोहा १२८ · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
राम चरन रति जो चह अथवा पद निर्बान। भाव सहित सो यह कथा करउ श्रवन पुट पान॥ १२८ ॥
अर्थ
जो श्रीरामजी के चरणों में प्रेम चाहता हो या मोक्षपद चाहता हो, वह इस कथारूपी अमृत को भाव सहित अपने कानों के पुट से पिये।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का दोहा १२८ है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।
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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति