यह न कहिअ सठही हठसीलहि

चौपाई २, दोहा १२८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

यह न कहिअ सठही हठसीलहि। जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि॥ कहिअ न लोभिहि क्रोधिहि कामिहि। जो न भजइ सचराचर स्वामिहि॥ २ ॥

अर्थ

यह कथा उनसे न कहनी चाहिये जो शठ और हठी स्वभाव के हों तथा जो श्रीहरि की लीलाओं को मन लगाकर न सुनते हों। लोभी, क्रोधी और कामी को, जो चराचर के स्वामी को नहीं भजते, यह कथा नहीं कहनी चाहिये।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १२८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।

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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति