द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ
द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ
चौपाई ३, दोहा १२८ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ। सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ॥ राम कथा के तेइ अधिकारी। जिन्ह कें सत संगति अति प्यारी॥ ३ ॥
अर्थ
ब्राह्मणों के द्रोही को कभी नहीं सुनानी चाहिये, चाहे वह देवराज के समान हो या राजा हो। श्रीराम की कथा के अधिकारी वे ही हैं जिनको सत्संगति अत्यन्त प्रिय है।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १२८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।
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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति