पाई न केहिं गति पतित पावन

छन्द १, दोहा १३० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

छन्द पाठ

पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना। गनिका अजामिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना॥ आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे। कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते॥ १ ॥

अर्थ

अरे मूर्ख मन! सुन, पतितों को भी पावन करनेवाले श्रीराम को भजकर किसने परमगति नहीं पायी? गणिका, अजामिल, व्याध, गीध, गज आदि बहुत-से दुष्टों को उन्होंने तार दिया। आभीर, यवन, किरात, खस, स्वपच आदि जो अत्यन्त पापरूप ही हैं, वे भी केवल एक बार जिनका नाम लेकर पवित्र हो जाते हैं, उन श्रीरामजी को मैं नमस्कार करता हूँ।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का छन्द १, दोहा १३० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।

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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति