सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता

चौपाई १, दोहा १२७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता॥ धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता॥ १ ॥

अर्थ

जिसका मन श्रीरामजी के चरणों में अनुरक्त है, वही सर्वज्ञ है, वही गुणी है, वही ज्ञाता है। वही पृथ्वी का भूषण, पण्डित और दानी है। वही धर्मपरायण है और वही कुल का रक्षक है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “रामायण माहात्म्य और फलस्तुति” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १२७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामायण की महिमा, तुलसीदास की विनय और पाठ-श्रवण के पुण्यफल का वर्णन है।

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रामायण माहात्म्य और फलस्तुति