बार बार कौसल्या बिनय करइ कर
बार बार कौसल्या बिनय करइ कर
दोहा २०२ · बालकाण्ड
दोहा पाठ
बार बार कौसल्या बिनय करइ कर जोरि। अब जनि कबहूँ ब्यापै प्रभु मोहि माया तोरि॥ २०२ ॥
अर्थ
कौसल्याजी बार-बार हाथ जोड़कर विनय करती हैं कि अब प्रभु की आपकी माया मुझे कभी न व्यापे।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीराम का प्राकट्य और बाललीला” प्रकरण का दोहा २०२ है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के मंगलमय प्राकट्य और आनंदमयी बाललीलाओं का वर्णन है।
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श्रीराम का प्राकट्य और बाललीला