तन पुलकित मुख बचन न आवा

चौपाई ३, दोहा २०२ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

तन पुलकित मुख बचन न आवा। नयन मूदि चरननि सिरु नावा॥ बिसमयवंत देखि महतारी। भए बहुरि सिसुरूप खरारी॥ ३ ॥

अर्थ

शरीर पुलकित हो गया, मुख से वचन नहीं निकला। तब आँखें मूँदकर उसने श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में सिर नवाया। माता को आश्चर्यचकित देखकर खरके शत्रु श्रीरामजी फिर बालरूप हो गये।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “श्रीराम का प्राकट्य और बाललीला” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २०२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के मंगलमय प्राकट्य और आनंदमयी बाललीलाओं का वर्णन है।

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श्रीराम का प्राकट्य और बाललीला