भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी

छन्द १, दोहा १९२ के अंतर्गत · बालकाण्ड

छन्द पाठ

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी। हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥ लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी। भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥ १ ॥

अर्थ

दीनों पर दया करनेवाले, कौसल्याजी के हितकारी कृपालु प्रभु प्रकट हुए। मुनियों के मन को हरनेवाले उनके अद्भुत रूप को देखकर माता हर्ष से भर गयी। नेत्रों को आनन्द देनेवाला मेघ के समान श्यामशरीर था; चारों भुजाओं में अपने (खास) आयुध [धारण किये हुए] थे; [दिव्य] आभूषण और वनमाला पहने थे; बड़े-बड़े नेत्र थे। इस प्रकार शोभाके समुद्र तथा खर राक्षस को मारनेवाले भगवान्‌ प्रकट हुए।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “श्रीराम का प्राकट्य और बाललीला” प्रकरण का छन्द १, दोहा १९२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के मंगलमय प्राकट्य और आनंदमयी बाललीलाओं का वर्णन है।

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श्रीराम का प्राकट्य और बाललीला