अस्तुति करि न जाइ भय माना

चौपाई ४, दोहा २०२ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

अस्तुति करि न जाइ भय माना। जगत पिता मैं सुत करि जाना॥ हरि जननी बहुबिधि समुझाई। यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई॥ ४ ॥

अर्थ

स्तुति की भी नहीं जा सकी; वह डर गई कि मैंने जगत्-पिता को पुत्र करके जाना। हरि ने माता को बहुत प्रकार से समझाया [और कहा—] हे माई! सुनो, यह बात कहीं मत कहना।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “श्रीराम का प्राकट्य और बाललीला” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २०२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के मंगलमय प्राकट्य और आनंदमयी बाललीलाओं का वर्णन है।

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श्रीराम का प्राकट्य और बाललीला