गै जननी सिसु पहिं भयभीता
गै जननी सिसु पहिं भयभीता
चौपाई ३, दोहा २०१ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
गै जननी सिसु पहिं भयभीता। देखा बाल तहाँ पुनि सूता॥ बहुरि आइ देखा सुत सोई। हृदयँ कंप मन धीर न होई॥ ३ ॥
अर्थ
माता भयभीत होकर (यह सोचकर कि वह तो पालने में सोया था, यहाँ किसने लाकर बैठा दिया?) पुत्र के पास गयीं, तो वहाँ बालक को सोया हुआ देखा। फिर [पूजास्थान में लौटकर] देखा कि वही पुत्र वहाँ [भोजन कर रहा] था। उनके हृदय में कम्प होने लगा और मन को धीरज नहीं होता।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीराम का प्राकट्य और बाललीला” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २०१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के मंगलमय प्राकट्य और आनंदमयी बाललीलाओं का वर्णन है।
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श्रीराम का प्राकट्य और बाललीला