अगनित रबि ससि सिव चतुरानन
अगनित रबि ससि सिव चतुरानन
चौपाई १, दोहा २०२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
अगनित रबि ससि सिव चतुरानन। बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन॥ काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ। सोउ देखा जो सुना न काऊ॥ १ ॥
अर्थ
अगणित सूर्य, चन्द्रमा, शिव, चतुर्मुख ब्रह्मा, बहुत-से पर्वत, नदियाँ, समुद्र, पृथ्वी, वन, काल, कर्म, गुण, ज्ञान और स्वभाव देखे। और वे पदार्थ भी देखे जो किसी ने सुने भी न थे।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीराम का प्राकट्य और बाललीला” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २०२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के मंगलमय प्राकट्य और आनंदमयी बाललीलाओं का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
श्रीराम का प्राकट्य और बाललीला