रघुपति बिमुख जतन कर कोरी
रघुपति बिमुख जतन कर कोरी
चौपाई २, दोहा २०० के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
रघुपति बिमुख जतन कर कोरी। कवन सकइ भव बंधन छोरी॥ जीव चराचर बस कै राखे। सो माया प्रभु सों भय भाखे॥ २ ॥
अर्थ
श्रीरघुनाथजी से विमुख रहकर मनुष्य चाहे करोड़ों उपाय करे, परन्तु उसका संसार-बन्धन कौन छुड़ा सकता है। जिसने सब चराचर जीवों को वश में करके रखा है, वही माया प्रभु से भय खाती है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीराम का प्राकट्य और बाललीला” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २०० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के मंगलमय प्राकट्य और आनंदमयी बाललीलाओं का वर्णन है।
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श्रीराम का प्राकट्य और बाललीला