मोहि अछत यहु होइ उछाहू

चौपाई २, दोहा ४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

मोहि अछत यहु होइ उछाहू। लहहिं लोग सब लोचन लाहू॥ प्रभु प्रसाद सिव सबइ निबाहीं। यह लालसा एक मन माहीं॥ २ ॥

अर्थ

मेरे जीते-जी यह आनन्द-उत्सव हो जाय, [जिससे] सब लोग अपने नेत्रों का लाभ प्राप्त करें। प्रभु के प्रसाद से शिवजी ने सब ही निबाह दिए; यही एक लालसा मन में रह गयी है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राज्याभिषेक की तैयारी, देवताओं की प्रार्थना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामराज्याभिषेक की तैयारी और देवताओं द्वारा सरस्वतीजी से वनगमन हेतु प्रार्थना का वर्णन है।

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राज्याभिषेक की तैयारी, देवताओं की प्रार्थना