सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती
सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती
चौपाई १, दोहा १२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती॥ देखि देव पुनि कहहिं निहोरी। मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी॥ १ ॥
अर्थ
देवताओं की विनती सुनकर सरस्वतीजी खड़ी-खड़ी पछता रही हैं कि [हाय!] मैं कमलवन के लिये हेमन्त-ऋतु की रात हुई। उन्हें इस प्रकार पछताते देखकर देवता फिर विनय करके कहने लगे- हे माता! इसमें आपको जरा भी दोष न लगेगा।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राज्याभिषेक की तैयारी, देवताओं की प्रार्थना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामराज्याभिषेक की तैयारी और देवताओं द्वारा सरस्वतीजी से वनगमन हेतु प्रार्थना का वर्णन है।
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राज्याभिषेक की तैयारी, देवताओं की प्रार्थना