बार बार गहि चरन सँकोची

चौपाई ३, दोहा १२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

बार बार गहि चरन सँकोची। चली बिचारि बिबुध मति पोची॥ ऊँच निवासु नीचि करतूती। देखि न सकहिं पराइ बिभूती॥ ३ ॥

अर्थ

बार-बार चरण पकड़कर देवताओं ने सरस्वती को संकोच में डाल दिया। तब वह यह विचारकर चली कि देवताओं की बुद्धि ओछी है। इनका निवास तो ऊँचा है, पर इनकी करनी नीची है। ये दूसरे का ऐश्वर्य नहीं देख सकते।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राज्याभिषेक की तैयारी, देवताओं की प्रार्थना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामराज्याभिषेक की तैयारी और देवताओं द्वारा सरस्वतीजी से वनगमन हेतु प्रार्थना का वर्णन है।

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राज्याभिषेक की तैयारी, देवताओं की प्रार्थना