भरत सरिस प्रिय को जग माहीं

चौपाई ४, दोहा ७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं॥ रामहि बंधु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ हृदउ जेहि भाँती॥ ४ ॥

अर्थ

और भरत के समान जगत् में [हमें] कौन प्यारा है! शकुन का बस, यही फल है, दूसरा नहीं। श्रीरामचन्द्रजी को [अपने] भाई भरत का दिन-रात ऐसा सोच रहता है जैसा कछुए का हृदय अंडों में रहता है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राज्याभिषेक की तैयारी, देवताओं की प्रार्थना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामराज्याभिषेक की तैयारी और देवताओं द्वारा सरस्वतीजी से वनगमन हेतु प्रार्थना का वर्णन है।

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राज्याभिषेक की तैयारी, देवताओं की प्रार्थना