नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें
नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें
चौपाई २, दोहा २ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें। लोकप करहिं प्रीति रुख राखें॥ तिभुवन तीनि काल जग माहीं। भूरिभाग दसरथ सम नाहीं॥ २ ॥
अर्थ
सब राजा उनकी कृपा चाहते हैं और लोकपालगण उनके रुख को रखते हुए (अनुकूल होकर) प्रीति करते हैं। [पृथ्वी, आकाश, पाताल] तीनों भुवनों में और [भूत, भविष्य, वर्तमान] तीनों कालों में दशरथजी के समान बड़भागी [और] कोई नहीं है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राज्याभिषेक की तैयारी, देवताओं की प्रार्थना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामराज्याभिषेक की तैयारी और देवताओं द्वारा सरस्वतीजी से वनगमन हेतु प्रार्थना का वर्णन है।
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राज्याभिषेक की तैयारी, देवताओं की प्रार्थना