बिमल बंस यहु अनुचित एकू

चौपाई ४, दोहा १० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

बिमल बंस यहु अनुचित एकू। बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू॥ प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगत मन कै कुटिलाई॥ ४ ॥

अर्थ

पर इस निर्मल वंश में यही एक अनुचित बात हो रही है कि और सब भाइयों को छोड़कर राज्याभिषेक एक बड़े का ही (मेरा ही) होता है। [तुलसीदासजी कहते हैं कि] प्रभु श्रीरामचन्द्रजी का यह सुन्दर, प्रेमपूर्ण पछितावा भक्तों के मन की कुटिलता को हर ले।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राज्याभिषेक की तैयारी, देवताओं की प्रार्थना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामराज्याभिषेक की तैयारी और देवताओं द्वारा सरस्वतीजी से वनगमन हेतु प्रार्थना का वर्णन है।

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राज्याभिषेक की तैयारी, देवताओं की प्रार्थना