सेवक सदन स्वामि आगमनू

चौपाई ३, दोहा ९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सेवक सदन स्वामि आगमनू। मंगल मूल अमंगल दमनू॥ तदपि उचित जनु बोलि सप्रीती। पठइअ काज नाथ असि नीती॥ ३ ॥

अर्थ

यद्यपि सेवक के घर स्वामी का पधारना मङ्गलों का मूल और अमङ्गलों का नाश करने वाला होता है, तथापि हे नाथ! उचित तो यही था कि प्रेमपूर्वक दास को ही कार्य के लिये बुला भेजते; ऐसी ही नीति है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राज्याभिषेक की तैयारी, देवताओं की प्रार्थना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामराज्याभिषेक की तैयारी और देवताओं द्वारा सरस्वतीजी से वनगमन हेतु प्रार्थना का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
राज्याभिषेक की तैयारी, देवताओं की प्रार्थना