अब अभिलाषु एकु मन मोरें

चौपाई ४, दोहा ३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजिहि नाथ अनुग्रह तोरें॥ मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू॥ ४ ॥

अर्थ

अब मेरे मन में एक ही अभिलाषा है। हे नाथ! वह भी आप ही के अनुग्रह से पूरी होगी। राजा के सहज प्रेम को देखकर मुनि ने प्रसन्न होकर कहा--नरेश। आज्ञा दीजिये (कहिये, क्या अभिलाषा है ?)।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राज्याभिषेक की तैयारी, देवताओं की प्रार्थना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामराज्याभिषेक की तैयारी और देवताओं द्वारा सरस्वतीजी से वनगमन हेतु प्रार्थना का वर्णन है।

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राज्याभिषेक की तैयारी, देवताओं की प्रार्थना