श्रवन समीप भए सित केसा

चौपाई ४, दोहा २ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

श्रवन समीप भए सित केसा। मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा॥ नृप जुबराजु राम कहुँ देहू। जीवन जनम लाहु किन लेहू॥ ४ ॥

अर्थ

[देखा कि] कानों के पास बाल सफेद हो गये हैं, मानो बुढ़ापा ऐसा उपदेश कर रहा है कि हे राजन्‌! श्रीरामचन्द्रजी को युवराज-पद देकर अपने जीवन और जन्म का लाभ क्यों नहीं लेते।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राज्याभिषेक की तैयारी, देवताओं की प्रार्थना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रामराज्याभिषेक की तैयारी और देवताओं द्वारा सरस्वतीजी से वनगमन हेतु प्रार्थना का वर्णन है।

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राज्याभिषेक की तैयारी, देवताओं की प्रार्थना