पुत्रोत्पत्ति, अयोध्याजी की रमणीयता, सनकादि का आगमन और संवाद
चारों भाइयों के घर पुत्रों का जन्म होता है और अयोध्याजी की शोभा और भी बढ़ जाती है। इसी बीच सनकादि मुनि पधारते हैं और प्रभु से परम तत्त्व पर पावन संवाद होता है।
उत्तरकाण्ड · प्रकरण ७ / २१
प्रकरण पाठ
बूझहिं बैठि राम गुन गाहा। कह हनुमान सुमति अवगाहा॥ सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं। बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिं॥ ३ ॥
अर्थ:
वहाँ बैठकर श्रीरामजी के गुणों की कथाएँ पूछते हैं और हनुमानजी अपनी सुन्दर बुद्धि से उन गुणों में गोता लगाकर उनका वर्णन करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी के निर्मल गुणों को सुनकर दोनों भाई अत्यन्त सुख पाते हैं और विनय करके बार-बार कहलवाते हैं।
सब कें गृह गृह होहिं पुराना। राम चरित पावन बिधि नाना॥ नर अरु नारि राम गुन गानहिं। करहिं दिवस निसि जात न जानहिं॥ ४ ॥
अर्थ:
सबके घर-घर में पुराणों और अनेक प्रकार के पवित्र रामचरित्रों की कथा होती है। पुरुष और स्त्री सभी श्रीरामचन्द्रजी का गुणगान करते हैं और इस आनन्द में दिन-रात का बीतना भी नहीं जान पाते।
जातरूप मनि रचित अटारीं। नाना रंग रुचिर गच ढारीं॥ पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग रंग बर॥ २ ॥
अर्थ:
[दिव्य] स्वर्ण और रत्नों से बनी हुई अट्टारियाँ हैं। उनमें [मणि-रत्नों की] अनेक रंगों की सुन्दर ढली हुई फर्शें हैं। नगर के चारों ओर अत्यन्त सुन्दर परकोटा बना है, जिस पर सुन्दर रंग-बिरंगे कँगूरे बने हैं।
धवल धाम ऊपर नभ चुंबत। कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत॥ बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं। गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं॥ ४ ॥
अर्थ:
उज्ज्वल महल ऊपर आकाश को चूम रहे हैं। महलों पर के कलश [अपने दिव्य प्रकाश से] मानो सूर्य, चन्द्रमा की भी निन्दा करते हैं। [महलों में] बहुत-सी मणियों से रचे हुए झरोखे सुशोभित हैं और घर-घर में मणियों के दीपक शोभा पा रहे हैं।
मनि दीप राजहिं भवन भ्राजहिं देहरीं बिद्रुम रची। मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची॥ सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रुचिर फटिक रचे। प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बहु बज्रन्हि खचे॥
अर्थ:
घरों में मणियों के दीपक शोभा दे रहे हैं। मूँगे की बनी हुई देहलियाँ चमक रही हैं। मणियों के खम्भे हैं। मरकत-मणियों से जड़ी हुई सोने की दीवारें ऐसी सुन्दर हैं मानो ब्रह्मा ने खास तौर से बनायी हों। महल सुन्दर, मनोहर और विशाल हैं। उनमें सुन्दर स्फटिक के आँगन बने हैं। प्रत्येक द्वार पर बहुत-से हीरों से जड़े हुए सोने के किवाड़ हैं।
मोर हंस सारस पारावत। भवननि पर सोभा अति पावत॥ जहँ तहँ देखहिं निज परिछाहीं। बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं॥ ३ ॥
अर्थ:
मोर, हंस, सारस और कबूतर घरों के ऊपर बड़ी ही शोभा पाते हैं। वे पक्षी [मणियों की दीवारों में और छत में] जहाँ-तहाँ अपनी परछाईं देखकर [वहाँ दूसरे पक्षी समझकर] बहुत प्रकार से मधुर बोली बोलते और नृत्य करते हैं।
बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए। जहँ भूप रमानिवास तहँ की संपदा किमि गाइए॥ बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते। सब सुखी सब सच्चरित सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे॥
अर्थ:
सुन्दर बाजार है, जो वर्णन करते नहीं बनता; वहाँ वस्तुएँ बिना ही मूल्य मिलती हैं। जहाँ स्वयं लक्ष्मीपति राजा हों, वहाँ की सम्पदा का वर्णन कैसे किया जाय ? बजाज (कपड़े का व्यापार करनेवाले), सराफ (रुपये-पैसे का लेन-देन करनेवाले) आदि वणिक् (व्यापारी) बैठे हुए ऐसे जान पड़ते हैं मानो अनेक कुबेर हों। स्त्री, पुरुष, बच्चे और बूढ़े जो भी हैं, सभी सुखी, सदाचारी और सुन्दर हैं॥
बापीं तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहीं। सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहीं॥ बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं। आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं॥
अर्थ:
अनुपम बावियाँ, तालाब और मनोहर तथा विशाल कुएँ शोभा दे रहे हैं, जिनकी सुन्दर सीढ़ियाँ और निर्मल जल देखकर देवता और मुनि तक मोहित हो जाते हैं। [तालाबों में] अनेक रंगों के कमल खिल रहे हैं, अनेक पक्षी कूज रहे हैं और भौरे गुंजार कर रहे हैं। [परम] रमणीय बगीचे कोयल आदि पक्षियों की [सुन्दर बोली से] मानो राह चलने वालों को बुला रहे हैं॥
जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं॥ भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि॥ १ ॥
अर्थ:
लोग जहाँ-तहाँ श्रीरघुनाथजी के गुण गाते हैं और बैठकर एक-दूसरे को यही सीख देते हैं कि शरणागत का पालन करने वाले श्रीरामजी को भजो; शोभा, शील, रूप और गुणों के धाम श्रीरघुनाथजी को भजो।
जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि॥ धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि॥ २ ॥
अर्थ:
कमलनयन और साँवले शरीरवाले को भजो। पलक जिस प्रकार नेत्रों की रक्षा करते हैं उसी प्रकार अपने सेवकों की रक्षा करनेवाले को भजो। सुन्दर बाण, धनुष और तरकस धारण करनेवाले को भजो। संतरूपी कमलवन के [खिलाने] के लिये सूर्यरूप रणधीर श्रीरामजी को भजो।
काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि॥ लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि॥ ३ ॥
अर्थ:
कालरूपी भयानक सर्प के भक्षण करनेवाले श्रीरामरूप गरुड़जी को भजो। निष्काम भाव से प्रणाम करते ही ममताका नाश कर देनेवाले श्रीरामजी को भजो। लोभ-मोहरूपी हरिनों के समूह के नाश करनेवाले श्रीरामरूप किरात को भजो। कामदेवरूपी हाथी के लिये सिंह रूप तथा सेवकों को सुख देनेवाले श्रीरामजी को भजो।
संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि॥ जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि॥ ४ ॥
अर्थ:
संशय और शोक रूपी घने अन्धकार के नाश करने वाले श्रीरामरूप सूर्य को भजो। राक्षस रूपी घने वन को जलाने वाले श्रीरामरूप अग्नि को भजो। श्रीजानकीजी समेत श्रीरघुबीर को क्यों नहीं भजते, जो जन्म-मृत्यु के भय का नाश करने वाले हैं?
बहु बासना मसक हिम रासिहि। सदा एकरस अज अबिनासिहि॥ मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि॥ ५ ॥
अर्थ:
बहुत-सी वासनाओं रूपी मच्छरों को नाश करने वाले श्रीरामरूप हिमराशि (बर्फ के ढेर) को भजो। नित्य एकरस, अजन्मा और अविनाशी श्रीरघुनाथजी को भजो। मुनियों को आनन्द देने वाले, पृथ्वी का भार उतारने वाले और तुलसीदास के उदार (दयालु) स्वामी श्रीरामजी को भजो।
जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा॥ पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका॥ १ ॥
अर्थ:
[काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] हे पक्षिराज गरुड़जी ! जब से रामप्रतापरूपी अत्यन्त प्रचण्ड सूर्य उदित हुआ, तबसे तीनों लोकों में पूर्ण प्रकाश भर गया है। इससे बहुतों को सुख और बहुतों के मन में शोक हुआ।
जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी। प्रथम अबिद्या निसा नसानी॥ अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने॥ २ ॥
अर्थ:
जिन-जिन को शोक हुआ, उन्हें मैं बखानकर कहता हूँ। [सर्वत्र प्रकाश छा जाने से] पहले तो अविद्या रूपी रात्रि नष्ट हो गयी। पाप रूपी उल्लू जहाँ-तहाँ छिप गये और काम-क्रोध रूपी कुमुद मुँद गये।
बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ। ए चकोर सुख लहहिं न काऊ॥ मत्सर मान मोह मद चोरा। इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा॥ ३ ॥
अर्थ:
भाँति-भाँति के [बन्धनकारक] कर्म, गुण, काल और स्वभाव--ये चकोर हैं, जो [रामप्रतापरूपी सूर्य के प्रकाश में] कभी सुख नहीं पाते। मत्सर (डाह), मान, मोह और मद रूपी जो चोर हैं, उनका हुनर (कला) भी किसी ओर नहीं चलता।
यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास। पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास॥ ३१ ॥
अर्थ:
यह श्रीरामप्रतापरूपी सूर्य जिसके हृदय में जब प्रकाश करता है, तब जिनका वर्णन पीछे से किया गया है, वे (धर्म, ज्ञान, विज्ञान, सुख, सन्तोष, वैराग्य और विवेक) बढ़ जाते हैं और जिनका वर्णन पहले किया गया है, वे (अविद्या, पाप, काम, क्रोध, कर्म, काल, गुण, स्वभाव आदि) नाश को प्राप्त होते हैं (नष्ट हो जाते हैं)।
रूप धरें जनु चारिउ बेदा। समदरसी मुनि बिगत बिभेदा॥ आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं॥ ३ ॥
अर्थ:
मानो चारों वेद ही बाल-रूप धारण किये हों। वे मुनि समदर्शी और भेदरहित हैं। दिशाएँ ही उनके वस्त्र हैं। उनके एक ही व्यसन है कि जहाँ श्रीरघुनाथजी की चरित्र-कथा होती है, वहाँ जाकर वे उसे अवश्य सुनते हैं।
तहाँ रहे सनकादि भवानी। जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी॥ राम कथा मुनिबर बहु बरनी। ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी॥ ४ ॥
अर्थ:
[शिवजी कहते हैं--] हे भवानी! सनकादि मुनि वहाँ गये थे (वहीं से चले आ रहे थे) जहाँ ज्ञानी मुनिश्रेष्ठ श्रीअगस्त्यजी रहते थे। श्रेष्ठ मुनि ने श्रीरामजी की बहुत-सी कथाएँ वर्णन की थीं, जो ज्ञान उत्पन्न करने में उसी प्रकार समर्थ हैं, जैसे अरणि लकड़ी से अग्नि उत्पन्न होती है।
तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा। स्रवत नयन जल पुलक सरीरा॥ कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे। परम मनोहर बचन उचारे॥ ३ ॥
अर्थ:
उनकी [प्रेमविह्वल] दशा देखकर [उन्हीं की भाँति] श्रीरघुनाथजी के नेत्रों से भी [प्रेमाश्रुओं का] जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया। तदनन्तर प्रभु ने हाथ पकड़कर श्रेष्ठ मुनियों को बैठाया और परम मनोहर वचन कहे--।
आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा॥ बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनहिं प्रयास होहिं भवभंगा॥ ४ ॥
अर्थ:
हे मुनीशो! सुनिये, आज मैं धन्य हूँ। आपके दर्शनों ही से [सारे] पाप नष्ट हो जाते हैं। बड़े ही भाग्य से सत्संग की प्राप्ति होती है, जिससे बिना ही परिश्रम जन्म-मृत्यु का चक्र नष्ट हो जाता है।
जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर॥ जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर॥ २ ॥
अर्थ:
हे निर्गुण! आपकी जय हो। हे गुण के समुद्र! आपकी जय हो, जय हो। आप सुख के धाम, [अत्यन्त] सुन्दर और अति नागर (चतुर) हैं। हे इंदिरा-रमन! आपकी जय हो। हे भूधर! आपकी जय हो। आप अनुपम, अज, अनादि और शोभा के भण्डार हैं।
ग्यान निधान अमान मानप्रद। पावन सुजस पुरान बेद बद॥ तग्य कृतग्य अग्यता भंजन। नाम अनेक अनाम निरंजन॥ ३ ॥
अर्थ:
आप ज्ञान के भण्डार, [स्वयं] अमान और [दूसरों को] मान देनेवाले हैं। पावन सुजस पुराण और वेद [आपकी स्तुति करते हैं]। आप तग्य, कृतज्ञ, अज्ञान का भंजन करनेवाले हैं। हे निरंजन! आपके अनेक [अनन्त] नाम हैं और आप अनाम हैं (अर्थात् आप नामातीत हैं)।
सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय। बससि सदा हम कहुँ परिपालय॥ द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय। हृदि बसि राम काम मद गंजय॥ ४ ॥
अर्थ:
आप सर्वरूप हैं, सब में व्याप्त हैं और सबके हृदय-रूपी घर में सदा निवास करते हैं; [अतः] आप हमारा परिपालन कीजिये। [राग-द्वेष, अनुकूलता-प्रतिकूलता, जन्म-मृत्यु आदि] द्वंद्व, विपत्ति और भव-फंद को काट दीजिये। हृदय में बसकर, हे राम! काम और मद का नाश कर दीजिये।
देहु भगति रघुपति अति पावनि। त्रिबिधि ताप भव दाप नसावनि॥ प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु। होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु॥ १ ॥
अर्थ:
हे रघुपति! आप हमें अपनी अत्यन्त पवित्र करनेवाली और तीनों प्रकार के तापों तथा भव-दाह का नाश करनेवाली भक्ति दीजिये। हे शरणागतों की कामना पूर्ण करने के लिये सुरधेनु और कल्पतरु रूप प्रभो! प्रसन्न होकर हमें यही वर दीजिये।
भव बारिधि कुंभज रघुनायक। सेवत सुलभ सकल सुख दायक॥ मन संभव दारुन दुख दारय। दीनबंधु समता बिस्तारय॥ २ ॥
अर्थ:
हे रघुनाथजी! आप भव-सागर को सुखानेवाले अगस्त्य के समान हैं। आपकी सेवा करने में आप सुलभ हैं तथा सब सुखों के देनेवाले हैं। हे दीनबन्धु! मन से उत्पन्न दारुण दुःखों का नाश कीजिये और [हममें] समता का विस्तार कीजिये।
आस त्रास इरिषादि निवारक। बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक॥ भूप मौलि मनि मंडन धरनी। देहि भगति संसृति सरि तरनी॥ ३ ॥
अर्थ:
आप [विषयों की] आशा, भय और ईर्ष्या आदिके निवारण करनेवाले हैं तथा विनय, विवेक और वैराग्य के विस्तार करनेवाले हैं। हे राजाओं के शिरोमणि एवं पृथ्वी के भूषण श्रीरामजी ! संसृति (जन्म-मृत्यु के प्रवाह)-रूपी नदी के लिये नौकारूप अपनी भक्ति प्रदान कीजिये।
मुनि मन मानस हंस निरंतर। चरन कमल बंदित अज संकर॥ रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक। काल करम सुभाउ गुन भच्छक॥ ४ ॥
अर्थ:
हे मुनियों के मनरूपी मानसरोवर में निरन्तर निवास करनेवाले हंस! आपके चरणकमल ब्रह्माजी और शिवजी के द्वारा वन्दित हैं। आप रघुकुल के केतु, वेदमर्यादा के रक्षक और काल, कर्म, स्वभाव तथा गुण [-रूप बन्धनों] के भक्षक (नाशक) हैं।