पुत्रोत्पत्ति, अयोध्याजी की रमणीयता, सनकादि का आगमन और संवाद

चारों भाइयों के घर पुत्रों का जन्म होता है और अयोध्याजी की शोभा और भी बढ़ जाती है। इसी बीच सनकादि मुनि पधारते हैं और प्रभु से परम तत्त्व पर पावन संवाद होता है।

उत्तरकाण्ड · प्रकरण ७ / २१

प्रकरण पाठ

चौपाई

अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं। श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं॥ दुइ सुत सुंदर सीताँ जाए। लव कुस बेद पुरानन्ह गाए॥ ३ ॥

अर्थ:

वे दिन-रात ब्रह्माजी को मनाते रहते हैं और [उनसे] श्रीरघुवीर के चरणों में प्रीति चाहते हैं। सीताजी ने दो सुन्दर पुत्र उत्पन्न किए, लव और कुश, जिनका वर्णन वेद-पुराणों ने किया है।

चौपाई

दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर। हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर॥ दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। भए रूप गुन सील घनेरे॥ ४ ॥

अर्थ:

वे दोनों ही विजयी, विनयी और गुणों के धाम हैं, और अत्यन्त सुन्दर हैं, मानो श्रीहरि के प्रतिबिम्ब ही हों। दो-दो पुत्र सभी भाइयों के हुए, जो रूप, गुण और शील में बहुत अधिक थे।

दोहा

ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार। सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार॥ २५ ॥

अर्थ:

जो ज्ञान, वाणी, गोतीत, अज, माया, मन और गुणों के पार हैं, वही सच्चिदानन्दघन भगवान् श्रेष्ठ नर चरित करते हैं।

दोहा 26 के अंतर्गत
चौपाई

प्रातकाल सरऊ करि मज्जन। बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन॥ बेद पुरान बसिष्ट बखानहिं। सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं॥ १ ॥

अर्थ:

प्रातःकाल सरयू में स्नान करके ब्राह्मणों और सज्जनों के साथ सभाँ में बैठते हैं। वसिष्ठजी वेद और पुराणों का वर्णन करते हैं और श्रीरामजी सुनते हैं, यद्यपि वे सब जानते हैं।

चौपाई

अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं। देखि सकल जननीं सुख भरहीं॥ भरत सत्रुहन दोनउ भाई। सहित पवनसुत उपबन जाई॥ २ ॥

अर्थ:

वे भाइयों को साथ लेकर भोजन करते हैं। उन्हें देखकर सभी माताएँ आनन्द से भर जाती हैं। भरतजी और शत्रुघ्नजी दोनों भाई हनुमानजी सहित उपवनों में जाते हैं।

चौपाई

बूझहिं बैठि राम गुन गाहा। कह हनुमान सुमति अवगाहा॥ सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं। बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिं॥ ३ ॥

अर्थ:

वहाँ बैठकर श्रीरामजी के गुणों की कथाएँ पूछते हैं और हनुमानजी अपनी सुन्दर बुद्धि से उन गुणों में गोता लगाकर उनका वर्णन करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी के निर्मल गुणों को सुनकर दोनों भाई अत्यन्त सुख पाते हैं और विनय करके बार-बार कहलवाते हैं।

चौपाई

सब कें गृह गृह होहिं पुराना। राम चरित पावन बिधि नाना॥ नर अरु नारि राम गुन गानहिं। करहिं दिवस निसि जात न जानहिं॥ ४ ॥

अर्थ:

सबके घर-घर में पुराणों और अनेक प्रकार के पवित्र रामचरित्रों की कथा होती है। पुरुष और स्त्री सभी श्रीरामचन्द्रजी का गुणगान करते हैं और इस आनन्द में दिन-रात का बीतना भी नहीं जान पाते।

दोहा

अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज। सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज॥ २६ ॥

अर्थ:

जहाँ भगवान् श्रीरामचन्द्रजी स्वयं राजा होकर विराजमान हैं, उस अवधपुरी के निवासियों के सुख-सम्पदा के समाज का वर्णन हजारों शेषजी भी नहीं कर सकते।

दोहा 27 के अंतर्गत
चौपाई

नारदादि सनकादि मुनीसा। दरसन लागि कोसलाधीसा॥ दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं। देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं॥ १ ॥

अर्थ:

नारद आदि और सनक आदि मुनीश्वर सब कोसलाधीश श्रीरामजी के दर्शन के लिये प्रतिदिन अयोध्या आते हैं और उस [दिव्य] नगर को देखकर वैराग्य भुला देते हैं।

चौपाई

जातरूप मनि रचित अटारीं। नाना रंग रुचिर गच ढारीं॥ पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग रंग बर॥ २ ॥

अर्थ:

[दिव्य] स्वर्ण और रत्नों से बनी हुई अट्टारियाँ हैं। उनमें [मणि-रत्नों की] अनेक रंगों की सुन्दर ढली हुई फर्शें हैं। नगर के चारों ओर अत्यन्त सुन्दर परकोटा बना है, जिस पर सुन्दर रंग-बिरंगे कँगूरे बने हैं।

चौपाई

नव ग्रह निकर अनीक बनाई। जनु घेरी अमरावति आई॥ महि बहु रंग रचित गच काँचा। जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा॥ ३ ॥

अर्थ:

मानो नवग्रहोंने बड़ी भारी सेना बनाकर अमरावती को आकर घेर लिया हो। पृथ्वी पर अनेकों रंगों के काँचों (रत्नों) की गच बनायी गयी है, जिसे देखकर श्रेष्ठ मुनियों का मन नाच उठता है।

चौपाई

धवल धाम ऊपर नभ चुंबत। कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत॥ बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं। गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं॥ ४ ॥

अर्थ:

उज्ज्वल महल ऊपर आकाश को चूम रहे हैं। महलों पर के कलश [अपने दिव्य प्रकाश से] मानो सूर्य, चन्द्रमा की भी निन्दा करते हैं। [महलों में] बहुत-सी मणियों से रचे हुए झरोखे सुशोभित हैं और घर-घर में मणियों के दीपक शोभा पा रहे हैं।

छन्द

मनि दीप राजहिं भवन भ्राजहिं देहरीं बिद्रुम रची। मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची॥ सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रुचिर फटिक रचे। प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बहु बज्रन्हि खचे॥

अर्थ:

घरों में मणियों के दीपक शोभा दे रहे हैं। मूँगे की बनी हुई देहलियाँ चमक रही हैं। मणियों के खम्भे हैं। मरकत-मणियों से जड़ी हुई सोने की दीवारें ऐसी सुन्दर हैं मानो ब्रह्मा ने खास तौर से बनायी हों। महल सुन्दर, मनोहर और विशाल हैं। उनमें सुन्दर स्फटिक के आँगन बने हैं। प्रत्येक द्वार पर बहुत-से हीरों से जड़े हुए सोने के किवाड़ हैं।

दोहा

चारु चित्रसाला गृह गृह प्रति लिखे बनाइ। राम चरित जे निरख मुनि ते मन लेहिं चोराइ॥ २७ ॥

अर्थ:

घर-घर में सुन्दर चित्रशालाएँ हैं, जिनमें रामचरित बड़ी सुन्दरता के साथ सँवारकर अंकित किये हुए हैं। जिन्हें मुनि देखते हैं, तो वे उनके भी चित्त को चुरा लेते हैं।

दोहा 28 के अंतर्गत
चौपाई

सुमन बाटिका सबहिं लगाईं। बिबिध भाँति करि जतन बनाईं॥ लता ललित बहु जाति सुहाईं। फूलहिं सदा बसंत कि नाईं॥ १ ॥

अर्थ:

सभी लोगों ने भिन्न-भिन्न प्रकार की पुष्पों की वाटिकाएँ यत्न करके लगा रखी हैं, जिनमें बहुत जातियों की सुन्दर और ललित लताएँ सदा बसन्त की नाईं फूलती रहती हैं।

चौपाई

गुंजत मधुकर मुखर मनोहर। मारुत त्रिबिधि सदा बह सुंदर॥ नाना खग बालकन्हि जिआए। बोलत मधुर उड़ात सुहाए॥ २ ॥

अर्थ:

भौरे मनोहर स्वर से गुंजार करते हैं। सदा तीनों प्रकार की सुन्दर वायु बहती रहती है। बालकों ने बहुत-से पक्षी पाल रखे हैं, जो मधुर बोली बोलते हैं और उड़ने में सुन्दर लगते हैं।

चौपाई

मोर हंस सारस पारावत। भवननि पर सोभा अति पावत॥ जहँ तहँ देखहिं निज परिछाहीं। बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

मोर, हंस, सारस और कबूतर घरों के ऊपर बड़ी ही शोभा पाते हैं। वे पक्षी [मणियों की दीवारों में और छत में] जहाँ-तहाँ अपनी परछाईं देखकर [वहाँ दूसरे पक्षी समझकर] बहुत प्रकार से मधुर बोली बोलते और नृत्य करते हैं।

चौपाई

सुक सारिका पढ़ावहिं बालक। कहहु राम रघुपति जनपालक॥ राज दुआर सकल बिधि चारू। बीथीं चौहट रुचिर बजारू॥ ४ ॥

अर्थ:

बालक सुक-सारिका को पढ़ाते हैं कि कहो— 'राम', 'रघुपति', 'जनपालक'। राजद्वार सब प्रकार से सुन्दर है। गलियाँ, चौराहे और बाजार सभी सुन्दर हैं।

छन्द

बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए। जहँ भूप रमानिवास तहँ की संपदा किमि गाइए॥ बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते। सब सुखी सब सच्चरित सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे॥

अर्थ:

सुन्दर बाजार है, जो वर्णन करते नहीं बनता; वहाँ वस्तुएँ बिना ही मूल्य मिलती हैं। जहाँ स्वयं लक्ष्मीपति राजा हों, वहाँ की सम्पदा का वर्णन कैसे किया जाय ? बजाज (कपड़े का व्यापार करनेवाले), सराफ (रुपये-पैसे का लेन-देन करनेवाले) आदि वणिक् (व्यापारी) बैठे हुए ऐसे जान पड़ते हैं मानो अनेक कुबेर हों। स्त्री, पुरुष, बच्चे और बूढ़े जो भी हैं, सभी सुखी, सदाचारी और सुन्दर हैं॥

दोहा

उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर। बाँधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर॥ २८ ॥

अर्थ:

नगर के उत्तर दिशा में सरयू बह रही हैं, जिनका जल निर्मल और गहरा है। मनोहर घाट बँधे हुए हैं, किनारे पर जरा भी कीचड़ नहीं है।

दोहा 29 के अंतर्गत
चौपाई

दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा॥ पनिघट परम मनोहर नाना। तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना॥ १ ॥

अर्थ:

अलग कुछ दूरी पर वह सुन्दर घाट है, जहाँ घोड़े और हाथी ठट्ट-के-ठट्ट जल पिया करते हैं। पानी भरने के लिये बहुत-से [जनाने] घाट हैं, जो बड़े ही मनोहर हैं। वहाँ पुरुष स्नान नहीं करते।

चौपाई

राजघाट सब बिधि सुंदर बर। मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर॥ तीर तीर देवन्ह के मंदिर। चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर॥ २ ॥

अर्थ:

राजघाट सब प्रकार से सुन्दर और श्रेष्ठ है, जहाँ चारों वर्णों के पुरुष स्नान करते हैं। सरयूजी के किनारे-किनारे देवताओं के मन्दिर हैं, जिनके चारों ओर सुन्दर उपवन (बगीचे) हैं।

चौपाई

कहुँ कहुँ सरिता तीर उदासी। बसहिं ग्यान रत मुनि संन्यासी॥ तीर तीर तुलसिका सुहाई। बृंद बृंद बहु मुनिन्ह लगाई॥ ३ ॥

अर्थ:

नदी के किनारे कहीं-कहीं विरक्त और ज्ञानपरायण मुनि और संन्यासी निवास करते हैं। सरयूजी के किनारे-किनारे सुन्दर तुलसिका के वृन्द-वृन्द बहुत-से मुनियों ने लगा रखे हैं।

चौपाई

पुर सोभा कछु बरनि न जाई। बाहेर नगर परम रुचिराई॥ देखत पुरी अखिल अघ भागा। बन उपबन बापिका तड़ागा॥ ४ ॥

अर्थ:

नगर की शोभा तो कुछ कही नहीं जाती। नगर के बाहर भी परम सुन्दरता है। श्री अयोध्या पुरी के दर्शन करते ही सम्पूर्ण पाप भाग जाते हैं। [वहाँ] वन, उपवन, बावलियाँ और तालाब सुशोभित हैं।

छन्द

बापीं तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहीं। सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहीं॥ बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं। आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं॥

अर्थ:

अनुपम बावियाँ, तालाब और मनोहर तथा विशाल कुएँ शोभा दे रहे हैं, जिनकी सुन्दर सीढ़ियाँ और निर्मल जल देखकर देवता और मुनि तक मोहित हो जाते हैं। [तालाबों में] अनेक रंगों के कमल खिल रहे हैं, अनेक पक्षी कूज रहे हैं और भौरे गुंजार कर रहे हैं। [परम] रमणीय बगीचे कोयल आदि पक्षियों की [सुन्दर बोली से] मानो राह चलने वालों को बुला रहे हैं॥

दोहा

रमानाथ जहँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ। अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ॥ २९ ॥

अर्थ:

स्वयं लक्ष्मीपति भगवान् जहाँ राजा हों, उस नगर का कहीं वर्णन किया जा सकता है? अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ और समस्त सुख-सम्पत्तियाँ अयोध्या में छाई रहती हैं।

दोहा 30 के अंतर्गत
चौपाई

जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं॥ भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि॥ १ ॥

अर्थ:

लोग जहाँ-तहाँ श्रीरघुनाथजी के गुण गाते हैं और बैठकर एक-दूसरे को यही सीख देते हैं कि शरणागत का पालन करने वाले श्रीरामजी को भजो; शोभा, शील, रूप और गुणों के धाम श्रीरघुनाथजी को भजो।

चौपाई

जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि॥ धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि॥ २ ॥

अर्थ:

कमलनयन और साँवले शरीरवाले को भजो। पलक जिस प्रकार नेत्रों की रक्षा करते हैं उसी प्रकार अपने सेवकों की रक्षा करनेवाले को भजो। सुन्दर बाण, धनुष और तरकस धारण करनेवाले को भजो। संतरूपी कमलवन के [खिलाने] के लिये सूर्यरूप रणधीर श्रीरामजी को भजो।

चौपाई

काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि॥ लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि॥ ३ ॥

अर्थ:

कालरूपी भयानक सर्प के भक्षण करनेवाले श्रीरामरूप गरुड़जी को भजो। निष्काम भाव से प्रणाम करते ही ममताका नाश कर देनेवाले श्रीरामजी को भजो। लोभ-मोहरूपी हरिनों के समूह के नाश करनेवाले श्रीरामरूप किरात को भजो। कामदेवरूपी हाथी के लिये सिंह रूप तथा सेवकों को सुख देनेवाले श्रीरामजी को भजो।

चौपाई

संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि॥ जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि॥ ४ ॥

अर्थ:

संशय और शोक रूपी घने अन्धकार के नाश करने वाले श्रीरामरूप सूर्य को भजो। राक्षस रूपी घने वन को जलाने वाले श्रीरामरूप अग्नि को भजो। श्रीजानकीजी समेत श्रीरघुबीर को क्यों नहीं भजते, जो जन्म-मृत्यु के भय का नाश करने वाले हैं?

चौपाई

बहु बासना मसक हिम रासिहि। सदा एकरस अज अबिनासिहि॥ मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि॥ ५ ॥

अर्थ:

बहुत-सी वासनाओं रूपी मच्छरों को नाश करने वाले श्रीरामरूप हिमराशि (बर्फ के ढेर) को भजो। नित्य एकरस, अजन्मा और अविनाशी श्रीरघुनाथजी को भजो। मुनियों को आनन्द देने वाले, पृथ्वी का भार उतारने वाले और तुलसीदास के उदार (दयालु) स्वामी श्रीरामजी को भजो।

दोहा

एहि बिधि नगर नारि नर करहिं राम गुन गान। सानुकूल सब पर रहहिं संतत कृपानिधान॥ ३० ॥

अर्थ:

इस प्रकार नगर के स्त्री-पुरुष श्रीरामजी का गुण-गान करते हैं और कृपानिधान श्रीरामजी सदा सब पर अत्यन्त प्रसन्न रहते हैं।

दोहा 31 के अंतर्गत
चौपाई

जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा॥ पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका॥ १ ॥

अर्थ:

[काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] हे पक्षिराज गरुड़जी ! जब से रामप्रतापरूपी अत्यन्त प्रचण्ड सूर्य उदित हुआ, तबसे तीनों लोकों में पूर्ण प्रकाश भर गया है। इससे बहुतों को सुख और बहुतों के मन में शोक हुआ।

चौपाई

जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी। प्रथम अबिद्या निसा नसानी॥ अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने॥ २ ॥

अर्थ:

जिन-जिन को शोक हुआ, उन्हें मैं बखानकर कहता हूँ। [सर्वत्र प्रकाश छा जाने से] पहले तो अविद्या रूपी रात्रि नष्ट हो गयी। पाप रूपी उल्लू जहाँ-तहाँ छिप गये और काम-क्रोध रूपी कुमुद मुँद गये।

चौपाई

बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ। ए चकोर सुख लहहिं न काऊ॥ मत्सर मान मोह मद चोरा। इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा॥ ३ ॥

अर्थ:

भाँति-भाँति के [बन्धनकारक] कर्म, गुण, काल और स्वभाव--ये चकोर हैं, जो [रामप्रतापरूपी सूर्य के प्रकाश में] कभी सुख नहीं पाते। मत्सर (डाह), मान, मोह और मद रूपी जो चोर हैं, उनका हुनर (कला) भी किसी ओर नहीं चलता।

चौपाई

धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना। ए पंकज बिकसे बिधि नाना॥ सुख संतोष बिराग बिबेका। बिगत सोक ए कोक अनेका॥ ४ ॥

अर्थ:

धर्मरूपी तालाब में ज्ञान, विज्ञान--ये अनेकों प्रकार के कमल खिल उठे। सुख, संतोष, वैराग्य और विवेक--ये अनेकों चकवे शोकरहित हो गये।

दोहा

यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास। पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास॥ ३१ ॥

अर्थ:

यह श्रीरामप्रतापरूपी सूर्य जिसके हृदय में जब प्रकाश करता है, तब जिनका वर्णन पीछे से किया गया है, वे (धर्म, ज्ञान, विज्ञान, सुख, सन्तोष, वैराग्य और विवेक) बढ़ जाते हैं और जिनका वर्णन पहले किया गया है, वे (अविद्या, पाप, काम, क्रोध, कर्म, काल, गुण, स्वभाव आदि) नाश को प्राप्त होते हैं (नष्ट हो जाते हैं)।

दोहा 32 के अंतर्गत
चौपाई

भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा। संग परम प्रिय पवनकुमारा॥ सुंदर उपबन देखन गए। सब तरु कुसुमित पल्लव नए॥ १ ॥

अर्थ:

एक बार भाइयों सहित श्रीरामचन्द्रजी परम प्रिय हनुमानजी को साथ लेकर सुन्दर उपवन देखने गये। वहाँ के सब वृक्ष फूले हुए और नये पत्तों से युक्त थे।

चौपाई

जानि समय सनकादिक आए। तेज पुंज गुन सील सुहाए॥ ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना॥ २ ॥

अर्थ:

सुअवसर जानकर सनकादि मुनि आए, जो तेज के पुंज, सुन्दर गुण और शील से युक्त तथा सदा ब्रह्मानन्द में लवलीन रहते हैं। देखने में तो वे बालक लगते हैं, परन्तु हैं बहुत समय के।

चौपाई

रूप धरें जनु चारिउ बेदा। समदरसी मुनि बिगत बिभेदा॥ आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

मानो चारों वेद ही बाल-रूप धारण किये हों। वे मुनि समदर्शी और भेदरहित हैं। दिशाएँ ही उनके वस्त्र हैं। उनके एक ही व्यसन है कि जहाँ श्रीरघुनाथजी की चरित्र-कथा होती है, वहाँ जाकर वे उसे अवश्य सुनते हैं।

चौपाई

तहाँ रहे सनकादि भवानी। जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी॥ राम कथा मुनिबर बहु बरनी। ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी॥ ४ ॥

अर्थ:

[शिवजी कहते हैं--] हे भवानी! सनकादि मुनि वहाँ गये थे (वहीं से चले आ रहे थे) जहाँ ज्ञानी मुनिश्रेष्ठ श्रीअगस्त्यजी रहते थे। श्रेष्ठ मुनि ने श्रीरामजी की बहुत-सी कथाएँ वर्णन की थीं, जो ज्ञान उत्पन्न करने में उसी प्रकार समर्थ हैं, जैसे अरणि लकड़ी से अग्नि उत्पन्न होती है।

दोहा

देखि राम मुनि आवत हरषि दंडवत कीन्ह। स्वागत पूँछि पीत पट प्रभु बैठन कहँ दीन्ह॥ ३२ ॥

अर्थ:

सनकादि मुनियों को आते देखकर श्रीरामचन्द्रजी ने हर्षित होकर दण्डवत् की और स्वागत पूछकर प्रभु ने [उनके] बैठने के लिये अपना पीताम्बर बिछा दिया।

दोहा 33 के अंतर्गत
चौपाई

कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई॥ मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी। भए मगन मन सके न रोकी॥ १ ॥

अर्थ:

फिर हनुमानजी सहित तीनों भाइयों ने दण्डवत्‌ की, सबको बड़ा सुख हुआ। मुनि श्रीरघुनाथजी की अतुलनीय छबि देखकर उसी में मग्र हो गये। वे मन को रोक न सके।

चौपाई

स्यामल गात सरोरुह लोचन। सुंदरता मंदिर भव मोचन॥ एकटक रहे निमेष न लावहिं। प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं॥ २ ॥

अर्थ:

वे जन्म-मृत्यु [के चक्र] से छुड़ानेवाले, श्यामशरीर, कमलनयन, सुन्दरताके धाम श्रीरामजी को टकटकी लगाये देखते ही रह गये, पलक नहीं मारते। और प्रभु के आगे हाथ जोड़े सिर नवा रहे हैं।

चौपाई

तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा। स्रवत नयन जल पुलक सरीरा॥ कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे। परम मनोहर बचन उचारे॥ ३ ॥

अर्थ:

उनकी [प्रेमविह्वल] दशा देखकर [उन्हीं की भाँति] श्रीरघुनाथजी के नेत्रों से भी [प्रेमाश्रुओं का] जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया। तदनन्तर प्रभु ने हाथ पकड़कर श्रेष्ठ मुनियों को बैठाया और परम मनोहर वचन कहे--।

चौपाई

आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा॥ बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनहिं प्रयास होहिं भवभंगा॥ ४ ॥

अर्थ:

हे मुनीशो! सुनिये, आज मैं धन्य हूँ। आपके दर्शनों ही से [सारे] पाप नष्ट हो जाते हैं। बड़े ही भाग्य से सत्संग की प्राप्ति होती है, जिससे बिना ही परिश्रम जन्म-मृत्यु का चक्र नष्ट हो जाता है।

दोहा

संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ। कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ॥ ३३ ॥

अर्थ:

संत का संग मोक्ष (भव-बन्धन से छूटने) का और कामी का संग जन्म-मृत्यु के बन्धन में पड़ने का मार्ग है। संत, कवि और कोविद तथा श्रुति, पुराण [आदि] सद्ग्रन्थ ऐसा कहते हैं।

दोहा 34 के अंतर्गत
चौपाई

सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी॥ जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय॥ १ ॥

अर्थ:

प्रभु के वचन सुनकर चारों मुनि हर्षित होकर, पुलकित शरीर से स्तुति करने लगे--हे भगवन्‌! आपकी जय हो। आप अनंत, अनामय, अनघ, अनेक (सब रूपों में प्रकट), एक (अद्वितीय) और करुणामय हैं।

चौपाई

जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर॥ जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर॥ २ ॥

अर्थ:

हे निर्गुण! आपकी जय हो। हे गुण के समुद्र! आपकी जय हो, जय हो। आप सुख के धाम, [अत्यन्त] सुन्दर और अति नागर (चतुर) हैं। हे इंदिरा-रमन! आपकी जय हो। हे भूधर! आपकी जय हो। आप अनुपम, अज, अनादि और शोभा के भण्डार हैं।

चौपाई

ग्यान निधान अमान मानप्रद। पावन सुजस पुरान बेद बद॥ तग्य कृतग्य अग्यता भंजन। नाम अनेक अनाम निरंजन॥ ३ ॥

अर्थ:

आप ज्ञान के भण्डार, [स्वयं] अमान और [दूसरों को] मान देनेवाले हैं। पावन सुजस पुराण और वेद [आपकी स्तुति करते हैं]। आप तग्य, कृतज्ञ, अज्ञान का भंजन करनेवाले हैं। हे निरंजन! आपके अनेक [अनन्त] नाम हैं और आप अनाम हैं (अर्थात् आप नामातीत हैं)।

चौपाई

सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय। बससि सदा हम कहुँ परिपालय॥ द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय। हृदि बसि राम काम मद गंजय॥ ४ ॥

अर्थ:

आप सर्वरूप हैं, सब में व्याप्त हैं और सबके हृदय-रूपी घर में सदा निवास करते हैं; [अतः] आप हमारा परिपालन कीजिये। [राग-द्वेष, अनुकूलता-प्रतिकूलता, जन्म-मृत्यु आदि] द्वंद्व, विपत्ति और भव-फंद को काट दीजिये। हृदय में बसकर, हे राम! काम और मद का नाश कर दीजिये।

दोहा

परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम। प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम॥ ३४ ॥

अर्थ:

आप परमानन्दस्वरूप, कृपा के धाम और मन की कामनाओं को परिपूर्ण करनेवाले हैं। हे श्रीरामजी ! हमको अपनी अविचल प्रेम-भक्ति दीजिये।

दोहा 35 के अंतर्गत
चौपाई

देहु भगति रघुपति अति पावनि। त्रिबिधि ताप भव दाप नसावनि॥ प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु। होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु॥ १ ॥

अर्थ:

हे रघुपति! आप हमें अपनी अत्यन्त पवित्र करनेवाली और तीनों प्रकार के तापों तथा भव-दाह का नाश करनेवाली भक्ति दीजिये। हे शरणागतों की कामना पूर्ण करने के लिये सुरधेनु और कल्पतरु रूप प्रभो! प्रसन्न होकर हमें यही वर दीजिये।

चौपाई

भव बारिधि कुंभज रघुनायक। सेवत सुलभ सकल सुख दायक॥ मन संभव दारुन दुख दारय। दीनबंधु समता बिस्तारय॥ २ ॥

अर्थ:

हे रघुनाथजी! आप भव-सागर को सुखानेवाले अगस्त्य के समान हैं। आपकी सेवा करने में आप सुलभ हैं तथा सब सुखों के देनेवाले हैं। हे दीनबन्धु! मन से उत्पन्न दारुण दुःखों का नाश कीजिये और [हममें] समता का विस्तार कीजिये।

चौपाई

आस त्रास इरिषादि निवारक। बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक॥ भूप मौलि मनि मंडन धरनी। देहि भगति संसृति सरि तरनी॥ ३ ॥

अर्थ:

आप [विषयों की] आशा, भय और ईर्ष्या आदिके निवारण करनेवाले हैं तथा विनय, विवेक और वैराग्य के विस्तार करनेवाले हैं। हे राजाओं के शिरोमणि एवं पृथ्वी के भूषण श्रीरामजी ! संसृति (जन्म-मृत्यु के प्रवाह)-रूपी नदी के लिये नौकारूप अपनी भक्ति प्रदान कीजिये।

चौपाई

मुनि मन मानस हंस निरंतर। चरन कमल बंदित अज संकर॥ रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक। काल करम सुभाउ गुन भच्छक॥ ४ ॥

अर्थ:

हे मुनियों के मनरूपी मानसरोवर में निरन्तर निवास करनेवाले हंस! आपके चरणकमल ब्रह्माजी और शिवजी के द्वारा वन्दित हैं। आप रघुकुल के केतु, वेदमर्यादा के रक्षक और काल, कर्म, स्वभाव तथा गुण [-रूप बन्धनों] के भक्षक (नाशक) हैं।

चौपाई

तारन तरन हरन सब दूषन। तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन॥ ५ ॥

अर्थ:

आप तरन-तारन (स्वयं तरे हुए और दूसरों को तारनेवाले) तथा सब दोषों को हरनेवाले हैं। हे प्रभु, तीनों लोकों के भूषण! तुलसीदास [आपकी स्तुति करते हैं]।

दोहा

बार बार अस्तुति करि प्रेम सहित सिरु नाइ। ब्रह्म भवन सनकादि गे अति अभीष्ट बर पाइ॥ ३५ ॥

अर्थ:

प्रेमसहित बार-बार स्तुति करके और सिर नवाकर तथा अपना अत्यन्त मनचाहा वर पाकर सनकादि मुनि ब्रह्मलोकको गये।