बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ
बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ
चौपाई ३, दोहा ३१ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ। ए चकोर सुख लहहिं न काऊ॥ मत्सर मान मोह मद चोरा। इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा॥ ३ ॥
अर्थ
भाँति-भाँति के [बन्धनकारक] कर्म, गुण, काल और स्वभाव--ये चकोर हैं, जो [रामप्रतापरूपी सूर्य के प्रकाश में] कभी सुख नहीं पाते। मत्सर (डाह), मान, मोह और मद रूपी जो चोर हैं, उनका हुनर (कला) भी किसी ओर नहीं चलता।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चारों भाइयों के पुत्रजन्म, अयोध्या की शोभा और सनकादि मुनियों के श्रीराम से परम तत्त्व संवाद का वर्णन है।
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पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन