मनि दीप राजहिं भवन भ्राजहिं देहरीं

छन्द, दोहा २७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

छन्द पाठ

मनि दीप राजहिं भवन भ्राजहिं देहरीं बिद्रुम रची। मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची॥ सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रुचिर फटिक रचे। प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बहु बज्रन्हि खचे॥

अर्थ

घरों में मणियों के दीपक शोभा दे रहे हैं। मूँगे की बनी हुई देहलियाँ चमक रही हैं। मणियों के खम्भे हैं। मरकत-मणियों से जड़ी हुई सोने की दीवारें ऐसी सुन्दर हैं मानो ब्रह्मा ने खास तौर से बनायी हों। महल सुन्दर, मनोहर और विशाल हैं। उनमें सुन्दर स्फटिक के आँगन बने हैं। प्रत्येक द्वार पर बहुत-से हीरों से जड़े हुए सोने के किवाड़ हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन” प्रकरण का छन्द, दोहा २७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चारों भाइयों के पुत्रजन्म, अयोध्या की शोभा और सनकादि मुनियों के श्रीराम से परम तत्त्व संवाद का वर्णन है।

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पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन