देहु भगति रघुपति अति पावनि
देहु भगति रघुपति अति पावनि
चौपाई १, दोहा ३५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
देहु भगति रघुपति अति पावनि। त्रिबिधि ताप भव दाप नसावनि॥ प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु। होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु॥ १ ॥
अर्थ
हे रघुपति! आप हमें अपनी अत्यन्त पवित्र करनेवाली और तीनों प्रकार के तापों तथा भव-दाह का नाश करनेवाली भक्ति दीजिये। हे शरणागतों की कामना पूर्ण करने के लिये सुरधेनु और कल्पतरु रूप प्रभो! प्रसन्न होकर हमें यही वर दीजिये।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चारों भाइयों के पुत्रजन्म, अयोध्या की शोभा और सनकादि मुनियों के श्रीराम से परम तत्त्व संवाद का वर्णन है।
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पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन