जलज बिलोचन स्यामल गातहि
जलज बिलोचन स्यामल गातहि
चौपाई २, दोहा ३० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि॥ धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि॥ २ ॥
अर्थ
कमलनयन और साँवले शरीरवाले को भजो। पलक जिस प्रकार नेत्रों की रक्षा करते हैं उसी प्रकार अपने सेवकों की रक्षा करनेवाले को भजो। सुन्दर बाण, धनुष और तरकस धारण करनेवाले को भजो। संतरूपी कमलवन के [खिलाने] के लिये सूर्यरूप रणधीर श्रीरामजी को भजो।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में चारों भाइयों के पुत्रजन्म, अयोध्या की शोभा और सनकादि मुनियों के श्रीराम से परम तत्त्व संवाद का वर्णन है।
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पुत्रजन्म, सनकादि का आगमन